रायगढ़ : प्रदेश के सबसे लंबे सूरजगढ़ पुल की बदहाली! 13 साल में उखड़ी प्रोटेक्शन लेयर, जगह-जगह निकले सरिए; अब 2.75 करोड़ से होगा कायाकल्प
1800 मीटर लंबे पुल पर मंडरा रहा हादसों का खतरा, चार साल से चल रही सतही मरम्मत भी नहीं आई काम; अब पूरी कांक्रीट लेयर उखाड़कर बिछाई जाएगी मैस्टिक और बिटुमिन की परत।
रायगढ़। सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और उनकी टिकाऊ उम्र पर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। रायगढ़ का प्रदेश का सबसे लंबा सूरजगढ़ पुल, जो कभी जिले की पहचान और गौरव माना जाता था, आज बदहाली की तस्वीर पेश कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिस पुल को दशकों तक मजबूत और सुरक्षित रहना चाहिए था, उसकी ऊपरी सतह महज 13 साल में ही जवाब देने लगी। कहीं कांक्रीट उखड़ चुकी है तो कहीं लोहे के सरिए बाहर निकल आए हैं। पुल से गुजरने वाले वाहन चालकों, खासकर दोपहिया सवारों के लिए ये निकले हुए सरिए कभी भी बड़े हादसे की वजह बन सकते हैं।
करीब 1800 मीटर लंबे इस पुल की हालत पिछले कुछ वर्षों से लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। बताया जा रहा है कि लगभग चार साल से पुल पर सतही मरम्मत के नाम पर काम किया जा रहा है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। जगह-जगह गड्ढे बन चुके हैं और पुल की ऊपरी सुरक्षा परत क्षतिग्रस्त हो गई है। कई स्थानों पर सरिए बाहर दिखाई देने लगे हैं। दोपहिया वाहन चालकों को इनसे बचकर निकलना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्रदेश के सबसे लंबे पुल की यह हालत इतनी जल्दी कैसे हो गई?
75 एमएम की प्रोटेक्शन लेयर उखड़ी, मुख्य संरचना पर भी खतरे की आशंका
पुल की सबसे ऊपरी सतह पर लगभग 75 एमएम मोटी प्रोटेक्शन लेयर यानी कांक्रीट की सुरक्षा परत बिछाई गई थी। इसका उद्देश्य मुख्य संरचना को सुरक्षित रखना था। लेकिन समय से पहले ही यह परत जगह-जगह से टूटकर उखड़ने लगी। कई हिस्सों में पैनल भी क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। अब स्थिति ऐसी हो गई है कि सामान्य पैचवर्क या सतही मरम्मत से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं दिख रहा।
इतने कम समय में सुरक्षा परत के खराब होने के पीछे निर्माण गुणवत्ता, सामग्री और रखरखाव की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इसकी वास्तविक वजह तकनीकी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। सवाल यह भी है कि निर्माण के समय गुणवत्ता की निगरानी किस स्तर पर हुई थी और इतने वर्षों में पुल की स्थिति लगातार खराब होने के बावजूद स्थायी मरम्मत में देरी क्यों हुई?
चार साल से मरम्मत का खेल, अब 2.75 करोड़ का प्रस्ताव
पुल की खराब होती स्थिति को देखते हुए अब सेतु विभाग ने इसके व्यापक मरम्मत कार्य के लिए करीब 2.75 करोड़ रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा है। प्रस्ताव के अनुसार, पहले पुल की पूरी क्षतिग्रस्त कांक्रीट प्रोटेक्शन लेयर को उखाड़कर हटाया जाएगा। इसके बाद नई तकनीक से मैस्टिक और बिटुमिन की परत बिछाई जाएगी, ताकि पुल की सतह को फिर से मजबूत और सुरक्षित बनाया जा सके।
यह काम लगभग 1800 मीटर लंबे पुल की पूरी सतह पर प्रस्तावित है। विभाग का मानना है कि अब अस्थायी मरम्मत के बजाय पूरी सुरक्षा परत को बदलना जरूरी हो गया है। हालांकि प्रस्ताव को शासन की मंजूरी और कार्य शुरू होने की प्रक्रिया अभी महत्वपूर्ण है।
गौरव का प्रतीक बना पुल अब हादसों का खतरा, जवाबदेही किसकी?
सूरजगढ़ पुल केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग भी है। ऐसे में इसकी बदहाल स्थिति हजारों लोगों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। पुल की सतह से सरिए निकलना और जगह-जगह गड्ढे होना सामान्य समस्या नहीं है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर करोड़ों रुपये की लागत से बने निर्माण की उम्र इतनी कम क्यों साबित हो रही है? क्या निर्माण के दौरान गुणवत्ता मानकों का सही तरीके से पालन हुआ था? क्या समय-समय पर तकनीकी निरीक्षण और रखरखाव किया गया? और अब जब 2.75 करोड़ रुपये की नई मरम्मत का प्रस्ताव तैयार किया गया है, तो क्या इस बार काम की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाएगी?
जनता को बार-बार मरम्मत के नाम पर खर्च नहीं, बल्कि मजबूत और सुरक्षित निर्माण चाहिए। सूरजगढ़ पुल की बदहाली अब केवल विभागीय मरम्मत का विषय नहीं, बल्कि निर्माण गुणवत्ता, सरकारी धन के उपयोग और आम लोगों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है।
