
सक्ती। भ्रष्टाचार दीमक की तरह देश को बर्बाद कर रहा है, और इसमें बहुत से भ्रष्ट अधिकारी और नेता शामिल हैं, लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते तो हैं लेकिन कोई लड़ने के लिए आगे नहीं आता, और अगर कोई आगे आ भी जाए तो उसे निपटाने सारे भ्रष्ट लोग लग जाते हैं और शाम, दाम, दण्ड, भेद कर अपना परचम लहरा ही लेते हैं।
लेकिन बापू ने कहा था कि “सत्य परेसान हो सकता पराजित नहीं” इसी तारतम्य में मैं पाठकों के लिए अगला भाग लेकर आया हूं। चूंकि इसमें अधिकारी का नाम सिर्फ इसलिए नहीं लिखा जा रहा है कि कानूनी पचड़े में फंस मैं अपनी एक मुहिम को बंद ना कर सकूं, ईमानदारी शब्द सिर्फ लोग अपने आपको दिखाने उपयोग करते हैं, लेकिन सच तो यही है कि बेईमानी चरम पर पहुंच चुकी है और इसके कर्णधार कुछ बेईमान अधिकारी ही हैं, अगर अधिकारी अपनी तनख्वाह में खुश रहने लगे तो क्या मजाल है कि नेता उनसे बेईमानी करवा सके, पहले कभी कभी बेईमानी या भ्रष्टाचार की बात उजागर होती थी तो लोग बहुत ज्यादा उस पर व्यक्त करते थे लेकिन अब भ्रष्टाचार तो शिष्टाचार में बदल गया है। इसी का फायदा उक्त ईगो वाला अधिकारी उठा रहा है। स्थानीय नेताजी कहीं ना कहीं एक ईमानदार छवि रखते हैं, लोग नेताजी पर बेईमानी का तो आक्षेप नहीं लगा सकते हैं लेकिन नेताजी के भरोसे को तार तार करता उक्त अधिकारी लगातार क्षेत्र का माहौल और भ्रष्टाचार को एक नया आयाम दे रहा है, कहीं ना कहीं उक्त अधिकारी की बेईमानी लोगों के बीच मील का पत्थर साबित हो रही है और कुछ और अधिकारियों की मनोस्थिति भी बड़े भ्रष्टाचार को करने की बनती जा रही है। क्या हमारा क्षेत्र अब भ्रष्टाचार का गढ़ बनेगा या उक्त अधिकारी पर डंडा चलेगा ये तो वक्त बताएगा, लेकिन अधिकारी की एक बड़ी मंशा में अंकुश जरूर लग गया, अब उसके और अधिक पैसा कमाने की चाह में कुछ रोड़ा पड़ा है, लेकिन एक कहावत है ना कि कुत्ते की दुम को छः माह भी पाइप में डाल कर रखो फिर निकालो तो वह टेढ़ी की टेढ़ी रहती है, ऐसा ही कुछ अंदाज हमारे अधिकारी महोदय की है, प्रदेश के जिस अधिकारी के पद पर उक्त अधिकारी पदस्थ हैं वो जनता से जुड़ा हुआ है और ऐसे में अधिकारी का भ्रष्ट होना कहीं ना कहीं जनता के हितों के साथ खिलवाड़ है। साथ ही छोटी छोटी चीजों में भी उक्त अधिकारी आपदा में अवसर ढूंढ ही लेता है, और लोगों के हितों के पैसों को अपनी तिजोरी का ताज बनाते जा रहा है। ऊपर तक बात और समाचार का सार लोगों तक और अधिकारी के गुर्गों तक तो पहुंच गया है। ईगोइस्ट अधिकारी व्यथित भी है साथ ही नेताजी की छवि की चिंता करने वाले अब अधिकारी के विरुद्ध काना फूसी भी चालू है, मगर जैसा कि हमेशा होता आया है कि कुछ दिनों तक ही यह चलता है और फिर लोग भूल जाते हैं, एक दिन आएगा कि पाठक भी हमारे समाचार या लेख को कुछ दिनों बाद ध्यान नहीं देंगे, क्योंकि यह चलता रहेगा, लेकिन यह भी सच है कि एक चिंगारी बहुत बड़े धमाका का भी कारण बन सकती है तो क्यों ना हम अपने लेख को जारी रखें और रही बात कार्यवाही की तो देश में आज भी ऐसे विभाग और अधिकारी जिंदा हैं जो देर से ही सही कार्यवाही तो करते हैं। मैंने पिछले भागों में उल्लेख भी किया है कि अपराध शाखा भ्रष्टाचार को सूंघने लगी है बस देखना है कि उनकी नाक में कब तक उक्त अधिकारी के भ्रष्टाचार की गंध पूरी तरह पहुंचेगी, लेकिन तय है कि पहुंचेगी तो जरूर। अब अधिकारी थोड़ा तिलमिला भी रहा है, वहीं ठेकेदारों के बीच कुछ खुशी भी देखने को मिल रही है कि कम से कम अब उक्त विभाग का 15 से 17 प्रतिसत चेक की राशि में भी कमीशन बंद हो सकता है, या कम तो होगा ही। अधिकारी तनख्वाह सरकार से काम का लेता है और ठेकेदार से दस्तूरी टैक्स लेकिन क्या दस्तूरी टैक्स के बिना अधिकारी का घर नहीं चलता है क्या ? शिक्षक पूरी ईमानदारी से काम करता है और सरकारी वेतन से घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, दवाई सब पूरा करता है लेकिन ऐसे कुछ भ्रष्ट अशिकारी ही होते हैं जो सिस्टम को जंग लगाकर खराब करने की कोशिश करते हैं। उक्त भ्रष्ट अधिकारी पर कार्यवाही ऐसे सभी लोगों के लिए एक मिसाल होगी जो भ्रष्टाचार को ही अपना सर्वस्व मानते हैं। जो अधिकारी की चाहत चांद तारे पाने की है वो उसे पूरा करने भ्रष्टाचार की आगोश में ही जायेगा, सरकार को अधिकारी के रहन सहन की भी देख रेख करनी चाहिए कि वह कहां घूम रहा है किस स्टैंडर्ड से अपने नाजायज शौकों को पूरा कर रहा है क्योंकि अधिकारी अगर वेतन से ज्यादा स्टैंडर्ड मेन्टेन कर रहा है तो वह भ्रष्ट है ये सच है और अधिकारी का रहन सहन एक सामने माध्यम वर्गीय परिवार सा है मतलब वह सिर्फ दाल में नमक जैसे ही दस्तूरी का प्रयोग करता है, मुंशी प्रेमचंद जी की एक कहानी गबन से पता चलता है कि जो सरकारी सेवक अगर दस्तूरी लेता है तो वह सिर्फ उन पैसों को अपनी अय्यासी में उड़ाता है ऐसे ही है हमारे अधिकारी साहब भी, जो सिर्फ इसलिए भ्रष्टाचार कर रहें हैं क्योंकि उन्हें देश, विदेश भ्रमण करना है और वेतन से तो यह अय्यासी नहीं हो सकती है। उनकी अय्यासी के लिए लिया गया दस्तूरी जाने कितने परिवारों को दो वक्त का खाना दे सकता है या फिर दस्तूरी बंद होने से विकास कार्य बहुत अच्छे और मजबूती से हो सकते हैं, अब देखना है कि उक्त अधिकारी की दस्तूरी यूं ही चालू रहती है या फिर बंद होती है लेकिन जो भी हो पाठकों को आगे भी मजेदार लेख मिलते रहेंगें और एक ईमानदार मुहिम यूं ही चलती रहेगी। बहुत जल्द उक्त अधिकारी के आगे के कारनामें वाले भाग यूं ही मिलते रहेंगें। बंद हुआ तो समझिएगा अधिकारी का स्थानांतरण हो गया है या मैं डर गया हूं, बिकूँगा नहीं यह तय है और वादा है।




