परिसीमन और महिला आरक्षण पर फिर गर्माया सियासी पारा: आगामी संसद सत्र में नया बिल लाने की तैयारी

नई दिल्ली:

देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के नए सिरे से पुनर्गठन (परिसीमन) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। बीते अप्रैल माह में 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर सर्वसम्मति न बन पाने और विशेष बहुमत के अभाव में बिल पारित न हो सकने के बाद, सरकार आगामी संसद सत्र में इस मुद्दे को नए सिरे से पटल पर रखने की रणनीति बना रही है।

क्या है मुख्य विवाद?

अप्रैल में पेश किए गए प्रस्ताव के तहत लोकसभा सीटों की संख्या को 543/550 से बढ़ाकर 850 करने और 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन प्रक्रिया शुरू कर 33% महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को जल्द लागू करने का खाका तैयार किया गया था। हालाँकि, दक्षिण भारतीय राज्यों और विपक्षी दलों के कड़े विरोध के चलते यह विधेयक कानून का रूप नहीं ले सका।

विपक्षी दलों और दक्षिणी राज्यों की प्रमुख चिंताएँ:

  1. उत्तर-दक्षिण का शक्ति संतुलन: तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण अभियानों को सफलता से लागू करने की उन्हें ‘राजनीतिक कीमत’ नहीं चुकानी चाहिए। यदि केवल आबादी को आधार बनाया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों की सीटें काफी बढ़ जाएंगी और दक्षिण का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
  2. 2027 की जनगणना की शर्त: विपक्ष की स्पष्ट मांग है कि किसी भी प्रकार का परिसीमन 2027 की आगामी पूर्ण जनगणना और जातिगत आंकड़ों के प्रकाशित होने के बाद ही किया जाए।

सरकार का रुख और आगे का रास्ता

संसदीय कार्य मंत्रालय और सत्तापक्ष की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि नए परिसीमन से किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होगा और दक्षिण भारत की सीटों में कटौती करने के बजाय सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक रूप से बढ़ाया जाएगा।

चूंकि संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई (2/3) विशेष बहुमत की आवश्यकता है, ऐसे में देखना होगा कि आगामी सत्र में सरकार विपक्षी दलों को साधने के लिए मसौदे में क्या बदलाव लाती है और क्या इस बार परिसीमन पर देश में राजनीतिक आम सहमति बन पाती है या नहीं।

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