५५ साल की गुलामी से दुर्ग के कांग्रेसियों को कब मिलेगी आजादी?

नरेश सोनी

दुर्ग। क्रांतिवीर फिल्म में नाना पाटेकर का एक प्रसिद्ध डॉयलॉग था कि लोगों को गुलामी करने की आदत हो गई। पहले मुगलों की गुलामी की, फिर अंग्रेजों की गुलामी की और अब नेताओं की गुलामी कर रहे हैं।

दुर्ग के संदर्भ में नाना पाटेकर का यह डॉयलॉग सौ फीसद खरा उतरता है। यहां शहर की कांग्रेसी राजनीति पिछले करीब ५५ वर्षों से एक ही परिवार की इर्द-गिर्द घूम रही है और कांग्रेस के तब से लेकर अब तक के कार्यकर्ता बस इसी परिवार की परिक्रमा में लगे हुए हैं। इस परिवार के चलते दुर्ग में कभी कोई दूसरा नेतृत्व उभर ही नहीं पाया। या कहें कि उभरने नहीं दिया गया। जो युवा प्रारम्भ में कांग्रेस से जमीनी स्तर पर जुड़े, वे वृद्ध होकर दुनिया भी छोड़ गए, लेकिन उन्हें कभी कोई अवसर नहीं मिला। न पद मिला, न प्रतिष्ठा मिली। न सम्मान मिला। मिला तो सिर्फ एक परिवार के पिछलग्गू होने का सर्टिफिकेट। और इस सर्टिफिकेट को किनारे कर जब कभी किसी कार्यकर्ता ने इस परिवार के खिलाफ खड़ा होने का साहस दिखाया, उसे कांग्रेस से ही किनारे लगा दिया गया।

सच, सचमुच में बहुत कड़वा होता है। …और सच्चाई यही है कि दुर्ग में वोरा परिवार की वजह से कभी किसी कांग्रेसी की दाल नहीं गल पाई। कभी राजस्थान से काम-धंधे के लिए एक व्यक्ति दुर्ग आया था। ये थे मोतीलाल वोरा। कांग्रेस की रीति-नीति से प्रभावित होकर उन्होंने पार्टी की सदस्यता ली। फिर नगर निगम और विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री बने फिर मुख्यमंत्री भी रहे। विधानसभा चुनाव लडऩे के दौरान वोरा ने बहुत सारे मित्र बनाए और यही लोग उनके बेहद करीबी भी कहलाए। मोतीलाल वोरा जब केन्द्रीय राजनीति में गए तो उनकी जगह खाली हुई सीट उनके मित्रों व करीबियों की बजाए उनके राजनीति में नौसिखिया पुत्र अरूण वोरा को मिली। आज करीब ५५ वर्ष बीत गए, दुर्ग शहर की कांग्रेसी राजनीति में वोरा परिवार के अलावा कोई सामने नहीं आ पाया।

अरूण वोरा पहली बार चुनाव जीतने के बाद लगातार तीन बार चुनाव हारे। बावजूद इसके उनकी टिकट हमेशा पक्की रही। इस दौरान टिकट वितरण के लिए एंटनी कमेटी की सिफारिशें भी लागू की गई ताकि पार्टी के ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी जीत पाएं। इन सिफारिशों में यह भी शामिल था कि दो बार चुनाव हार चुके व्यक्ति को टिकट नहीं देना है। कि ५००० से ज्यादा मतों से हारे प्रत्याशी की बजाए नए चेहरे पर दांव लगाना है। इसी तरह के कई और नियम-कायदों को दरकिनार कर अरूण वोरा को टिकट दी जाती रही। कई कांग्रेसियों ने आवाज भी उठाई, लेकिन उन्हें पार्टी के कार्यक्रमों में जय-जयकार करने, नारे लगाने और झंडा उठाने से ज्यादा तवज्जो कभी नहीं मिली। अब वोरा परिवार की तीसरी पीढ़ी मैदान में उतर चुकी है। अरूण वोरा के पुत्र को दुर्ग शहर का अगला वारिस भी बताया जाने लगा है।

दुर्ग में कांग्रेस को स्थापित करने के लिए जी-जान लगा देने वाले बुजुर्ग कांग्रेसी आज सवाल कर रहे हैं कि उन्हें आखिर मिला क्या? जो व्यक्ति अपनी युवावस्था में मोतीलाल वोरा के साथ जुड़ा था, उसके बेटे और अब उसके पोते भी कांग्रेस की राजनीति में हैं, लेकिन तीन पीढिय़ों के समर्पण का इस परिवार ने कभी कोई सिला नहीं दिया। कभी शहर की कांग्रेसी राजनीति की प्रमुख धूरी रही गरीब बस्ती मोहन नगर अब पद्मनाभपुर जैसे पॉश इलाके में तब्दील हो गई है, लेकिन चाहे संगठन में नियुक्तियों का मामला हो या फिर नगर निगम में टिकट बांटने से लेकर पद देने का, सारे काम इसी वोरा परिवार की बपौती बन गए है। अब तो नगर निगम के अधिकारियों को किस तरह काम करना है और किसे टेंडर बांटना है, यह भी तय होने लगा है। कांग्रेस के आम कार्यकर्ता पहले भी आम थे और अब भी आम ही हैं। वोरा परिवार की तीसरी पीढ़ी के आ जाने के बाद आगे भी वे आम ही रहेंगे।

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