बदलती राजनीति के साथ बदलते लोग, लोगों को उन्माद पसंद है क्योंकि देश में राजनीति नहीं जात और धर्म की पार्टियां हो चुकी हैं

India: एक समय था जब कोई व्यक्ति अपने क्षेत्र के मुद्दों को लेकर नेता बनता था लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में दल विशेष के आह्वान पर ही धरना देकर राजनीति की जा रही है।
इससे साफ है कि अब लोगों को अपने स्थानीय मुद्दों से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों से अंधप्रेम या कहें कि दिखावा हो गया है। 20 वीं सदी तक कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने उस कार्यकर्ता को पद देती थी जो स्थानीय मुद्दों को लेकर लड़ता था, मगर इक्कीसवीं सताब्दी के लगते ही चाटुकारों को पद मिलना प्रारंभ हो गया, तभी से राजनीति के मायने बदलने चालू हुए और आज सिर्फ लोग दलों की राजनीति कर इंसानियत भूलते जा रहें हैं। 90 कि दशक में जब हम स्कूल कॉलेजों में पढ़ाई करते थे तब युवा वर्ग स्कूल की स्थिति, शिक्षक की मांग को लेकर मैदान उतरते थे और आंदोलन करते थे, मगर बदलते राजनीतिक परिवेश में हम राजनीतिक पार्टियों के वर्चस्व के लिए लड़ रहें हैं, क्योंकि राजनीतिक पार्टी के पदाधिकारी अब जमीन से नहीं चाटूकारिता के दम पर पार्टी के पदाधिकारी बन रहें हैं। देश की तीन दल ऐसे हैं जो सबसे बड़े कहलाते हैं, जिनमे से दो दल सिर्फ अपने पतन की ओर अग्रसर हैं तो वहीं एक दल ऐसा है जो राजनीति में नैतिकता के पतन का जिम्मेदार है। जमीनी हकीकत से कोसों दूर अब एक नफरत की राजनीति जिसका बीज आजादी से पहले ही बोया जा चुका था शुरू हो गई है। अब हम वोट भी रुपयों के वजन देख देते हैं, और नेता भी जान रहा है कि चुनाव में पैसे ही हमें जीत दिलाएंगे, वहीं दूसरी ओर खुले तौर पर जात और धर्म की राजनीति चल रही है, वो हिन्दू समर्थक है तो वो मुस्लिम समर्थक बस यही राग अलाप कर हम देश में उन्माद फैला रहें हैं, जरा किसीने सोंचा है कि हर दल में सभी धर्म, जाती के लोग मौजूद हैं, तो फिर जात और धर्म की राजनीति क्यों? यह भी समझ से परे है। सिर्फ जमीनी कार्यकर्ता ही हर लड़ाई में क्यों मरता है, क्योंकि वह अपने नहीं नेताओ के द्वारा उन्मादी घुट्टी जो पिया रहता है। यही कारण है कि देश की राजनीति में अब अच्छे लोग नहीं बल्कि व्यापार की तरह सोंचने वाले लोग, व उन्माद की तरफ बढ़ने वाले लोग आ रहे हैं।

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