बस्तर में नक्सल मामलों के विचाराधीन बंदियों को मिल सकती है राहत, ग्रामीणों के केस वापसी पर सरकार कर रही विचार
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की जेलों में नक्सल मामलों में बंद विचाराधीन कैदियों को दीपावली के आसपास राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार उन ग्रामीणों के मामलों की समीक्षा कर रही है, जिन पर नक्सलियों के दबाव में राशन पहुंचाने, रेकी करने या पर्चे-बैनर लगाने जैसे आरोप हैं। हालांकि, यह राहत सभी बंदियों को नहीं मिलेगी। गंभीर हिंसक घटनाओं और प्रतिबंधित गतिविधियों से जुड़े मामलों को इससे अलग रखने की बात कही गई है।
किन मामलों में केस वापसी पर हो सकता है विचार?
गृह विभाग की समीक्षा बैठक से जुड़ी जानकारी के अनुसार, सरकार ऐसे मामलों पर विचार कर सकती है, जिनमें ग्रामीणों पर नक्सलियों के दबाव या भय के कारण सहयोग करने के आरोप हैं।
बताया गया है कि जिन मामलों में हत्या, हत्या के प्रयास, आईईडी विस्फोट, हथियार लूट, आगजनी या गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) जैसी गंभीर धाराएं शामिल नहीं हैं, उनकी अलग-अलग समीक्षा की जा सकती है।
उपमुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा ने कथित तौर पर अधिकारियों के साथ बैठक में स्पष्ट किया कि नक्सलियों के लिए सीधे हिंसक गतिविधियों में शामिल रहे लोगों को सामान्य राहत देने का प्रस्ताव नहीं है। हालांकि, सरकार की ओर से अंतिम निर्णय और पात्र मामलों की आधिकारिक सूची जारी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
सरेंडर करने वाले बड़े कैडरों के मामलों में अलग स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के महीनों में आत्मसमर्पण करने वाले कुछ वरिष्ठ नक्सली कैडरों ने अपने पुराने आपराधिक मामलों को वापस लेने की मांग की थी। इनमें डिविजनल कमेटी मेंबर (DVCM) और एरिया कमांडर स्तर के कैडर शामिल बताए गए हैं।
छत्तीसगढ़ की नक्सलवाद उन्मूलन नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वालों के पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता, जमीन और आजीविका से संबंधित प्रावधान हैं। लेकिन गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में केवल आत्मसमर्पण के आधार पर स्वतः मुकदमे समाप्त नहीं हो जाते। प्रत्येक मामले में लागू कानून और न्यायिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
केस वापसी के लिए अदालत की मंजूरी जरूरी
कानूनी प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार लोक अभियोजक को किसी मुकदमे को वापस लेने के लिए आवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकती है। हालांकि, अंतिम निर्णय संबंधित न्यायालय का होता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश झा के मुताबिक, अदालत यह देखती है कि मुकदमा वापस लेने का प्रस्ताव लोकहित और न्याय के व्यापक उद्देश्य के अनुरूप है या नहीं। गंभीर साक्ष्य अथवा अन्य परिस्थितियों को देखते हुए अदालत सरकार की अर्जी खारिज भी कर सकती है।
इसलिए सरकार की ओर से किसी मामले को समीक्षा के लिए चुन लेना अपने आप में आरोपी की रिहाई या मुकदमे की समाप्ति की गारंटी नहीं है।
तीन चरणों में हो सकती है प्रक्रिया
प्रकाशित रिपोर्ट में केस वापसी की संभावित प्रक्रिया को तीन चरणों में पूरा करने की बात कही गई है।
- पहला चरण: जिला स्तर पर कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और जिला अभियोजन अधिकारी की समितियां केस डायरी, चार्जशीट और धाराओं की समीक्षा करेंगी।
- दूसरा चरण: राज्य स्तरीय समिति समीक्षा के बाद पात्र मामलों की सूची पर विचार करेगी।
- तीसरा चरण: चयनित मामलों में संबंधित न्यायालयों के समक्ष मुकदमे वापस लेने के लिए आवेदन प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
रिपोर्ट में नवंबर के दौरान इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की संभावित समय-सारणी का भी उल्लेख है। हालांकि, इन तारीखों की आधिकारिक पुष्टि होना जरूरी है।
सभी बंदियों को नहीं मिलेगी राहत
सरकार की संभावित पहल का उद्देश्य उन ग्रामीणों के मामलों की समीक्षा करना बताया जा रहा है, जो कथित तौर पर नक्सलियों के भय या दबाव में उनके लिए काम करने के आरोप में जेल में बंद हैं। दूसरी ओर, गंभीर हिंसक अपराधों में आरोपित लोगों के मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी रहने की संभावना है।
फिलहाल इसे संभावित राहत के रूप में ही देखा जाना चाहिए। पात्र बंदियों की संख्या, जिलावार सूची और केस वापसी के अंतिम निर्णय की आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि कितने लोगों को इसका लाभ मिल सकता है।
