बिल्हा CHC में कंडम सामान की बिक्री पर गंभीर सवाल, तीन कोटेशन के बाद चौथे व्यक्ति को सौंप दिया सरकारी सामान!
न तकनीकी परीक्षण, न सामान की खरीदी कीमत का उल्लेख, न मूल्यांकन का आधार; 2024 की कंडम प्रक्रिया में दस्तावेजी पारदर्शिता पर उठे सवाल
अनिल शुक्ला की रिपोर्ट
बिलासपुर। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बिल्हा में वर्ष 2024 के दौरान अनुपयोगी और खराब सरकारी सामान को कंडम घोषित कर बेचने की प्रक्रिया अब गंभीर सवालों के घेरे में है। इस पूरे मामले में खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) द्वारा कंडम घोषित करने का आदेश जारी किया गया था और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) से प्रशासनिक एवं वित्तीय अनुमति भी प्राप्त की गई थी। कंडम किए गए सामानों की सूची भी तैयार की गई, लेकिन इसके बाद सामान के मूल्यांकन और बिक्री की जो प्रक्रिया अपनाई गई, उसमें कई ऐसी कमियां सामने आई हैं, जो सरकारी संपत्ति के निस्तारण की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं।
मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कंडम सामान की बिक्री के लिए तीन अलग-अलग वेंडरों से कोटेशन आमंत्रित किए गए थे, लेकिन उपलब्ध कोटेशन आधे-अधूरे दिखाई देते हैं। उनकी लिखावट और प्रस्तुति को देखकर यह संदेह भी पैदा होता है कि तीनों कोटेशन स्वतंत्र रूप से अलग-अलग फर्मों ने जमा किए थे या किसी एक ही व्यक्ति द्वारा तैयार किए गए थे। हालांकि इसकी पुष्टि हस्तलेखन परीक्षण या संबंधित फर्मों के बयान के बिना नहीं की जा सकती। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन तीन वेंडरों से कोटेशन मंगाए गए, उन्हें दरकिनार कर कंडम सामान का विक्रय निखिल सिंह राजपूत नामक चौथे व्यक्ति को कर दिया गया। आखिर इस चौथे व्यक्ति का चयन किस प्रक्रिया और किस स्वीकृति के आधार पर हुआ, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड CHC बिल्हा में उपलब्ध नहीं बताया जा रहा है।
न सामान का मूल्यांकन, न तकनीकी परीक्षण की रिपोर्ट
कंडम घोषित किए गए सामानों की सूची में उपकरणों और अन्य सरकारी सामग्री का उल्लेख तो किया गया, लेकिन उनकी मूल खरीदी कीमत, वर्तमान लेखा मूल्य और अनुमानित कबाड़ मूल्य का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है। किसी भी सामान को अनुपयोगी घोषित करने से पहले उसकी वास्तविक स्थिति, मरम्मत की संभावना और आर्थिक उपयोगिता का परीक्षण महत्वपूर्ण होता है। इसके बावजूद उपलब्ध दस्तावेजों में उपकरणों के तकनीकी परीक्षण की रिपोर्ट दिखाई नहीं देती। इसी तरह जिन सामग्रियों पर एक्सपायरी डेट अथवा निर्धारित उपयोग अवधि लागू होती है, उनके संबंध में भी आवश्यक विवरण का अभाव सवाल खड़े करता है।
सरकारी संपत्ति की बिक्री में मूल्यांकन, पारदर्शिता और जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांतों से बचा नहीं जा सकता।
सत्यापन करने वालों की भूमिका भी जांच के दायरे में
इस प्रकरण में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कंडम सामान के सत्यापन से संबंधित प्रक्रिया में डॉ. बी.के. गुप्ता, डॉ. निकिता कंवर, डॉ. सान्या तिवारी, अनिल अग्रवाल, नलिनी सिंह, वाई.आर. वाल्टर और हरिशंकर साहू के नाम सामने आए हैं। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि इन सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने किस आधार पर सामान का सत्यापन किया? क्या उन्होंने सामान की वास्तविक स्थिति, संख्या और गुणवत्ता का भौतिक परीक्षण किया था? क्या उन्हें बिक्री की प्रक्रिया और खरीदार के चयन की जानकारी थी? सत्यापन का अर्थ केवल सूची पर हस्ताक्षर करना था या सामान की वास्तविक स्थिति और मूल्यांकन की जिम्मेदारी भी उनके ऊपर थी?
इस मामले में हरिशंकर साहू की भूमिका भी चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे फार्मासिस्ट हैं, जिनकी मूल पदस्थापना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बिल्हा में न तो वर्ष 2024 के दौरान थी और न ही वर्तमान में है। ऐसे में सवाल उठता है कि बिल्हा CHC के कंडम सामान के सत्यापन में उनकी भूमिका किस प्रशासनिक आदेश अथवा अधिकृत दायित्व के तहत निर्धारित की गई थी? क्या उन्हें इस कार्य के लिए लिखित रूप से अधिकृत किया गया था? इसकी जांच जरूरी है।
चौथे व्यक्ति को बिक्री का आधार क्या था?
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि तीन वेंडरों से कोटेशन प्राप्त करने के बाद भी सामान का विक्रय निखिल सिंह राजपूत को कर दिया गया। यदि वे आमंत्रित तीन वेंडरों में शामिल नहीं थे तो उनके चयन का आधार क्या था? क्या उनसे कोई अलग कोटेशन लिया गया था? क्या सक्षम अधिकारी की अनुमति प्राप्त की गई थी? क्या अन्य वेंडरों की तुलना में उनकी दर अधिक थी या कम? सामान की वास्तविक बिक्री राशि कितनी थी और उसका भुगतान किस माध्यम से प्राप्त किया गया? इन सवालों के जवाब देने वाले दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आ रही है।
सरकारी संपत्ति का निस्तारण केवल कंडम आदेश जारी करने और सामान किसी व्यक्ति को सौंप देने से पूरा नहीं हो जाता। इसके लिए बिक्री की प्रक्रिया, प्राप्त राशि, भुगतान का प्रमाण, सामान की सुपुर्दगी और सरकारी लेखे में समुचित प्रविष्टि का रिकॉर्ड भी आवश्यक है। यदि इन दस्तावेजों का अभाव है तो यह महज कागजी कमी नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के निस्तारण की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है।
CMHO की अनुमति के बाद भी प्रक्रिया की जवाबदेही किसकी?
इस प्रकरण में CMHO बिलासपुर से प्रशासनिक एवं वित्तीय अनुमति प्राप्त होने की बात सामने आई है। ऐसे में जांच का दायरा केवल तत्कालीन खंड चिकित्सा अधिकारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि CMHO कार्यालय को कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे, अनुमति किन शर्तों पर दी गई थी और क्या वास्तविक बिक्री की प्रक्रिया स्वीकृत प्रस्ताव के अनुरूप पूरी हुई थी?
अब जरूरत है कि वर्ष 2024 के इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र प्रशासनिक एवं वित्तीय जांच कराई जाए। तीनों कोटेशन की वास्तविकता, चौथे व्यक्ति के चयन का आधार, सामान का वास्तविक मूल्य, सत्यापन करने वालों की अधिकृत भूमिका, बिक्री की राशि और सरकारी खाते में जमा भुगतान का मिलान कराया जाए। यदि किसी स्तर पर शासकीय संपत्ति के मूल्यांकन अथवा बिक्री में अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
इस विषय पर तत्कालीन बीएमओ डॉ एस के गुप्ता से चर्चा की गई जिसमें उन्होंने बताया कि सारे नियम और शर्तों का पालन कर मुख्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी के दिशा निर्देश अनुरूप सभी कंडम सामानो को विक्रय किया गया है
बिल्हा CHC का यह मामला केवल पुराने सामान की बिक्री का नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थान की संपत्ति के संरक्षण, उसके पारदर्शी निस्तारण और सरकारी धन के प्रति जवाबदेही का है। सवाल यह है कि जब तीन वेंडरों से कोटेशन बुलाए गए थे, तो चौथे व्यक्ति को सामान बेचने की जरूरत क्यों पड़ी और इस पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड आखिर कहां है?





