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हाई कोर्ट : दोहरे हत्या व डकैती मामले में पहले से दोषी ठहराए गए छह लोगों के रिहाई का दिया आदेश

हत्या के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। बेंच ने कहा कि, पुलिस के सामने दिए गए बयान को अदालत में अभियुक्त के खिलाफ पुख्ता सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। महतवपूर्ण टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने निचली अदालत के फैसले को भी रद कर दिया।

 बिलासपुर। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियतों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने साल 2015 में हुई दोहरी हत्या और डकैती के लिए पहले से दोषी ठहराए गए छह लोगों के रिहाई का आदेश दिया है।

मामला ट्रेलर चालक बोधन प्रसाद और उसके सहायक नीलेश कुमार की नृशंस हत्या से जुड़ा है। हत्या के बाद शव को सूरजपुर जिले के जंगल में फेंक दिया गया था। जनवरी 2018 में सूरजपुर के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने नाजिर खान (29), ओम प्रकाश जाट (50), पतुल उर्फ अब्दुल मजीद (30), दीपक लोहार (32), सुरेन्द्र लोहार (40) और विजय कुमार जाट (27) को दोषी ठहराया और हत्या, डकैती और सबूतों को गायब करने के लिए भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। पुलिस ने प्रारंभ में गुमशुदगी की रिपोर्ट के आधार पर मामला दर्ज किया और बाद में आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद उन पर आरोप लगाए। ट्रायल कोर्ट ने पुलिस के समक्ष दिए गए बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर किया भरोसा
मामले में मुख्य मुद्दों में से एक था अभियुक्तों द्वारा पुलिस के समक्ष दिए गए बयानों पर ट्रायल कोर्ट का भरोसा करना। अपीलकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 का हवाला देते हुए कहा कि इस आधार पर बयान अस्वीकार्य किया जाना था। यह धारा पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए बयानों को अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाता है। अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा किया, जिसमें चोरी किए गए ट्रेलर और अपराध से जुड़ी अन्य सामग्री की बरामदगी शामिल है। हालांकि, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सबूतों की श्रृंखला अधूरी थी और दोषसिद्धि का समर्थन करने के लिए अपर्याप्त थी।
पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य देने में विफल रहे
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने अपने फैसले में लिखा है कि, पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए बयानों को अभियुक्तों के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 का हवाला देते हुए कहा कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए बयान अस्वीकार्य हैं। किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ पुलिस अधिकारी के समक्ष दिए गए बयान को साबित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी लिखा है कि अभियोजन पक्ष अभियुक्त के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य देने में विफल रहा।
साक्ष्य का होना जरुरी
हाई कोर्ट ने कहा कि, जब कोई मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर निर्भर करता है, तो साक्ष्य की श्रृंखला पूरी होनी चाहिए और संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए। इस मामले में अदालत ने पाया कि श्रृंखला में कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब थीं। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि के लिए यह आवश्यक है कि स्थापित तथ्य केवल अभियुक्त के अपराध की परिकल्पना के अनुरूप हों तथा किसी अन्य उचित परिकल्पना को बाहर रखा जाना चाहिए।

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