गुप्त नवरात्रि क्या है जाने इसका महत्व मुहूर्त एवं पूजा विधि
*गुप्त नवरात्री 2026: इस साल कब से शुरू होंगे आषाढ़ गुप्त नवरात्रि? जान लें सही तारीख, महत्व और मुहूर्त*
*सनातन धर्म में नवरात्रों का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है. आषाढ़ नवरात्रि 9 दिनों और 9 रातों का एक विशेष पर्व है, जो माता शक्ति के नौ रूपों को समर्पित होता है. यह आषाढ़ महीने यानी जून-जुलाई में शुक्ल पक्ष के दौरान मनाया जाता है, इसलिए इसे गुप्त नवरात्रि भी कहा जाता है.*
*इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे- शाकंभरी नवरात्रि, वराही नवरात्रि, गायत्री नवरात्रि, भद्रकाली नवरात्रि आदि. इन 9 दिनों को बहुत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है. इस दौरान लोग माता शक्ति की पूजा करते हैं और खासतौर पर तंत्र साधना और गुप्त उपासना करते हैं, क्योंकि ये साधनाएं गुप्त रूप से की जाती हैं, इसलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है.*
*गुप्त नवरात्रि कब हैं?*
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक मनाई जाती है. *•वर्ष 2026 में यह 15 जुलाई से 23 जुलाई तक मनाई जाएगी.* इस दौरान देवी दुर्गा के गुप्त रूपों और दस महाविद्याओं की पूजा का विशेष विधान होता है.
*किस दिन किस माता की होगी पूजा*
`•15 जुलाई (प्रतिपदा)- शैलपुत्री`
`•16 जुलाई (द्वितीया)- ब्रह्मचारिणी`
`•17 जुलाई (तृतीया)- चंद्रघंटा`
`•18 जुलाई (चतुर्थी/पंचमी)- कूष्मांडा और स्कंदमाता`
`•19 जुलाई (षष्ठी)- कात्यायनी`
`•20 जुलाई (सप्तमी)- कालरात्रि`
`•21 जुलाई (अष्टमी)- महागौरी`
`•22-23 जुलाई (नवमी)- सिद्धिदात्री`
*गुप्त नवरात्रि का महत्व*
चैत्र और शारदीय नवरात्रि की तरह गुप्त नवरात्रि में सार्वजनिक उत्सव नहीं होते, बल्कि इसमें साधकों द्वारा अत्यंत गोपनीयता के साथ तंत्र-मंत्र और गुप्त साधनाएं की जाती हैं. यह पर्व मुख्य रूप से मनोवांछित फल की प्राप्ति, शत्रुओं पर विजय और आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करने के लिए उत्तम माना जाता है.
*पूजा विधि*
*कलश स्थापना-* अन्य नवरात्रियों की तरह इसमें भी पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाती है.
*साधना और मंत्र जाप-* सुबह और शाम दोनों समय देवी की पूजा करें. गुप्त साधनाओं में ‘दुर्गा सप्तशति’ का पाठ और तांत्रिक मंत्रों का गुप्त रूप से जाप किया जाता है.
*व्रत और दान-* नौ दिनों तक उपवास रखा जाता है और अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन करके व्रत का समापन किया जाता है.



