छत्तीसगढ़ भाजपा : अंतर्कलह, अफसरशाही का बढ़ता वर्चस्व और कार्यकर्ताओं के मोहभंग का सियासी संकट

भाजपा के सामने आज संकट सिर्फ विपक्ष की मुखरता का नहीं, बल्कि जनता के बदलते मूड और अपने ही संगठन के भीतर सुलगती बेचैनी का है। बिहार की बांकीपुर विधानसभा (जहां से भाजपा के राष्ट्रीय नेता लंबे समय तक विधायक रहे हैं) और मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जनता और कार्यकर्ताओं में एक गहरा असंतोष पनप रहा है।
अब यही राजनीतिक परिदृश्य छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर भी विकराल रूप लेता जा रहा है। रायगढ़, लैलूंगा, धरमजयगढ़ से लेकर राजधानी रायपुर तक पार्टी के भीतर जो कुछ चल रहा है, वह इस बात की गवाही देता है कि आज भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस नहीं, बल्कि उसका खुद का अंदरूनी असंतोष है।

1. विधानसभा के भीतर अपनी ही सरकार के खिलाफ मुखर होते अपने विधायक

छत्तीसगढ़ की राजनीति में हाल के दिनों में एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला ट्रेंड देखने को मिला है। जहाँ विपक्ष को सरकार घेरना चाहिए, वहीं अब विधानसभा के भीतर सत्ता पक्ष के अपने ही विधायक और नेता नीतियों, भ्रष्टाचार और कार्यप्रणाली को लेकर अपनी ही सरकार से सवाल-जवाब करते नजर आ रहे हैं।

  • जब सदन या सार्वजनिक मंचों पर पार्टी के अपने जनप्रतिनिधि तीखे सवाल उठाने लगें, तो यह साफ हो जाता है कि संवादहीनता चरम पर है।
  • पूर्व मंत्री और कद्दावर सांसद बृजमोहन अग्रवाल का सार्वजनिक रूप से अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता भी असहज हैं।
  • यह स्थिति दर्शाती है कि संगठन और सरकार के बीच समन्वय की भारी कमी है और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा हो रही है।

2. छत्तीसगढ़ भाजपा में क्यों सुलग रहा है यह असंतोष? (मूल कारण)

विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण और जमीनी हकीकत को टटोलने पर छत्तीसगढ़ भाजपा में इस असंतोष के मुख्य कारण निम्नलिखित उभरकर सामने आते हैं:

  • अफसरशाही का बेलगाम वर्चस्व: सरकार में नौकरशाही (ब्यूरोक्रैसी) इतनी हावी हो चुकी है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की पूछपरख लगभग खत्म हो गई है। लैलूंगा में ‘बड़े साहब’ द्वारा जनप्रतिनिधियों की लगातार उपेक्षा इसका ताजा उदाहरण है।
  • आयातित नेताओं का दबदबा और निष्ठावानों की उपेक्षा: जिन कार्यकर्ताओं ने दशकों तक जमीन पर पार्टी का झंडा उठाया, विरोध के कठिन दिनों में साथ निभाया, वे आज हाशिए पर हैं। दूसरी ओर, हाल ही में दूसरे दलों से आए ‘आयातित चेहरों’ को निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में बैठा दिया गया है।
  • संगठन में वैचारिक पतन और स्वार्थ की संस्कृति: भाजपा की पहचान उसकी विचारधारा और अनुशासित संगठन से थी। लेकिन आज कई कार्यकर्ता यह सवाल पूछने लगे हैं कि क्या संगठन की पहचान बची है या यह सिर्फ सत्ता उपभोग का माध्यम बन गया है। जुए, सट्टे और तस्करी में कार्यकर्ताओं के नाम आने और दागियों को पार्टी में तवज्जो मिलने से मूल कार्यकर्ता आहत हैं।
  • सेवा बनाम ‘सूची’ की राजनीति: रायगढ़ जिले की जनसुनवाई और औद्योगिक बैठकों का हाल इसका गवाही देता है। अब चर्चा विकास या जनता की सेवा की नहीं, बल्कि कथित ‘आर्थिक हिस्सेदारी वाली सूचियों’ की होती है। मंडल स्तर पर मारपीट और वर्चस्व की लड़ाई ने इसे और बदतर कर दिया है।

3. क्षेत्रीय सुगबुगाहट: रायगढ़, लैलूंगा और धरमजयगढ़ की चेतावनी

  • रायगढ़ – सेवा से ज्यादा ‘सूची’ की चर्चा: रायगढ़ में उद्योगों की जनसुनवाई और विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा उस सूची की होती है जिसमें नामों को लेकर विवाद रहता है। हालिया मंडल अध्यक्षों से मारपीट की घटनाओं ने साफ कर दिया है कि मंच अब सेवा का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थों का अखाड़ा बनता जा रहा है।
  • लैलूंगा – रवि भगत का मामला और दमनकारी नीति: डीएमएफ (DMF) फंड जैसे स्थानीय और जनहित के मुद्दों पर अपनी ही सरकार से सवाल पूछने वाले युवा नेता रवि भगत के साथ संवाद स्थापित करने के बजाय दमनकारी कार्रवाई (जेर और चक्का जाम) की गई। यह सिर्फ एक नेता का मामला नहीं है, बल्कि इसने हर उस कार्यकर्ता के मन में डर और रोष भर दिया है जो कल जनता के लिए आवाज उठाना चाहेगा।
  • धरमजयगढ़ – बाहरी चेहरों को थोपने की जिद और हार का चक्र: बीते तीन चुनावों से यह सीट कांग्रेस के पास है। स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बाहरी या ऊपर से थोपे गए चेहरों के कारण भाजपा लगातार यहां मात खाती आई है। यदि आगामी रणनीतियों में भी यही रवैया अपनाया गया, तो जमीन पर इसका भारी राजनीतिक नुकसान तय है।

नlसबसे बड़ा सवाल

राजनीति का एक शाश्वत सत्य है—किसी भी दल को विपक्ष उतना कमजोर नहीं करता, जितना अपने समर्पित कार्यकर्ताओं का मोहभंग कमजोर करता है।


आज छत्तीसगढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट कांग्रेस का मुकाबला करना नहीं है, बल्कि यह आत्मમंथन करना है कि क्या पार्टी अपने उन कार्यकर्ताओं, संघर्षशील नेताओं और मूल सिद्धांतों को वापस सम्मान दे पाएगी, जिनकी बदौलत आज पार्टी सत्ता के शिखर पर है। जब कार्यकर्ता पार्टी से मन से कट जाता है, तब चुनावी जीत भी भविष्य की गारंटी नहीं रहती।


अब देखना यह है कि क्या भाजपा शीर्ष नेतृत्व समय रहते इस भीतरखाने सुलगती आग को भांपकर संगठन को पटरी पर लाता है, या फिर यह असंतोष पार्टी के लिए एक बड़े राजनीतिक भूकम्प का कारण बनता है।

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