रायगढ़ जिले में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीजों की उपेक्षा: सरकारी योजनाओं के बाद भी मदद से वंचित पीड़ित परिवार

रायगढ़ जिले में गंभीर और दुर्लभ बीमारी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित मरीजों के परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। जिले में इस लाइलाज बीमारी से पीड़ित कुल तीन मरीजों की पहचान की गई है, जिनमें से एक मरीज रायगढ़ शहर, दूसरा सूपा (पुसौर) और तीसरा मरीज तमनार क्षेत्र में निवासरत है। इन पीड़ित परिवारों द्वारा लंबे समय से जिला प्रशासन से मदद की गुहार लगाई जा रही है, लेकिन अब तक प्रशासनिक स्तर पर किसी भी प्रकार की राहत या सहयोग संबंधित कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे परिवारों में गहरी निराशा व्याप्त है।

केन्द्र सरकार की नीति और प्रावधानों के बावजूद धरातल पर स्थिति शून्य

एक ओर जहां केंद्र सरकार दुर्लभ बीमारियों और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीजों के लिए वित्तीय सहायता और विशेष प्रावधानों की बात कर रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती के कारण मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव् द्वारा राज्यसभा सांसद डॉ. संगीता बलवंत को भेजे गए एक पत्र (दिनांक 28 अगस्त 2026) में स्पष्ट किया गया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (एन.पी.आर.डी.), 2021’ लागू की है। इसके तहत ‘डुचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ (DMD) को भी शामिल किया गया है, जिसमें चिन्हित दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए प्रति मरीज 50 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता का प्रावधान है।

इसके अलावा नीति के तहत वित्त मंत्रालय द्वारा ऐसी बीमारियों के इलाज में काम आने वाली दवाओं और विशेष चिकित्सा उत्पादों को आयात शुल्क व जीएसटी से पूरी तरह छूट दी गई है। साथ ही, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) जीन थेरेपी सहित स्वदेशी उपचार के विकास पर कार्य कर रही है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि ‘मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ को ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ की अनुसूची के तहत लोकोमोटर दिव्यांगता के रूप में मान्यता दी गई है, जिससे पीड़ित व्यक्ति सभी लागू सुविधाओं, आरक्षण और रियायतों के पात्र हैं।

प्रशासनिक उदासीनता पर उठ रहे सवाल

राष्ट्रीय स्तर पर नीति और वित्तीय सहायता के स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद रायगढ़ जिले के इन तीन पीड़ित परिवारों को अब तक किसी भी प्रकार की शासकीय सहायता या राहत नहीं मिल पाई है। स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की इस उदासीनता के कारण मरीज और उनके परिजन संघर्ष करने को मजबूर हैं। पीड़ित परिवारों ने प्रशासन से मांग की है कि केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ शीघ्र दिलवाया जाए और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी पीड़ितों के लिए जिले में उचित चिकित्सीय व आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जाए।

क्या है मस्कुलर डिस्ट्रॉफी

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Muscular Dystrophy) आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारियों का एक समूह है, जिसके कारण शरीर की मांसपेशियां समय के साथ लगातार कमजोर और क्षतिग्रस्त होती जाती हैं।
इस स्थिति के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • मांसपेशियों पर प्रभाव: यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर की उन मांसपेशियों को प्रभावित करती है जो चलने-फिरने और शरीर को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होती हैं। समय के साथ मांसपेशियों का घनत्व कम होने लगता है और कमजोरी बढ़ती जाती है।
  • प्रमुख प्रकार: इसके कई प्रकार होते हैं, जिनमें ‘डुचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ (DMD) सबसे आम और गंभीर रूपों में से एक है, जो आमतौर पर बच्चों में अधिक देखा जाता है।
  • कानूनी मान्यता: भारत में ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ के तहत मस्कुलर डिस्ट्रॉफी को ‘लोकोमोटर दिव्यांगता’ के रूप में शामिल किया गया है, जिससे पीड़ित व्यक्ति सरकारी सुविधाओं, आरक्षण और रियायतों के पात्र होते हैं।
  • सरकारी नीतियां और सहायता: केंद्र सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति’ के तहत इसे शामिल किया गया है, जिसमें इसके कुछ विशेष प्रकारों और उपचार के लिए वित्तीय सहायता के प्रावधान किए गए हैं।
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