एक कविता घर की लक्ष्मी बेटी के लिए

रिपोर्ट – Anchal Singh

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आप की आवाज
जौनपुर, उत्तर प्रदेश

किसी की गोद है सुनी,
कोई कचरे मे फेक रहा है।
कुत्ते नोच खाए…..
खड़े तमाशा देख रहा है..।
अरे पापियों….!
कैसे तुम पिता हो ?
तुम कैसी महतारी ?
कैसे दिल माना रे तेरा ?
क्या थी तेरी लाचारी ?
ऎसे कोई फेंकता है क्या ?
अपने दिल के टुकड़े को ?
अरे जरा सा पलट कर देख भी लेते…
उसके चांद से मुखड़े को ।। 1।।

तुम्हें लौटकर जाते देख,
वो माँ – माँ कर चिल्लाई होगी।
फेंक मत माँ मुझे – ऐसी
आवाज़ लगाई होगी !
अरे हत्यारों…..
दम ना था उसे पालने की,
फिर क्यु पेट मे आने दिया ?
अपने खून से सींच – सींच कर,
क्यु मरने को छोड़ दिया ।। 2 ।।

उसकी भूल बस इतनी सी थी !
की वो एक बेटी थी ।
अरे बेटे की चाह चाहने वाले,
तुम भी किसी की बेटी थी ।। 3 ।।

य़ह दकियानूसी सोच आज,
घर – घर मे जैसे फैल रहा है…
किसी माँ का आँचल खाली,
कोई कचरे मे है फेंक रहा ।
देखो बहनो आज तुम्हारी आंख खोलने,
शक्ति ने मन मे ठाना है
देर से ही सही ऐसे छोटी सोच को मिटाना है ।। 4 ।।

लेखक – शक्तिमान मिश्रा,
केराकत जौनपुर।

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