
लैलूंगा के ‘केलो’ जैविक जवाफूल चावल की लद्दाख तक पहुंच, कारगिल के गरकोन गांव में हुई सराहना, किसानों के लिए बढ़ी नई बाजार संभावनाएं
लद्दाख के कारगिल जिले के गरकोन गांव तक पहुंचा छत्तीसगढ़ का सुगंधित ‘केलो’ जैविक जवाफूल चावल, ग्रामीणों ने की खुलकर प्रशंसा
रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र से भेजा गया ‘केलो’ जैविक जवाफूल चावल अब देश के सुदूर उत्तरी हिस्से लद्दाख के कारगिल जिले के गरकोन गांव तक पहुंच गया है। पार्सल पहुंचने के बाद स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में इसे खोला गया। चावल की प्राकृतिक सुगंध और गुणवत्ता ने लोगों को प्रभावित किया, जिसके बाद स्थानीय नागरिकों ने इसकी खुलकर सराहना की। लद्दाखी परंपरा के अनुसार लोगों ने ‘जुले-जुले’ कहकर आभार व्यक्त किया और इसे एक विशेष अनुभव बताया।
ग्रामीणों की मांग पर प्रशासन की पहल से शुरू हुई चावल और बीज की आपूर्ति, वीडियो के जरिए हुई थी रुचि की अभिव्यक्ति
जानकारी के अनुसार कुछ समय पहले गरकोन गांव के एक उपभोक्ता ने वीडियो संदेश के माध्यम से लैलूंगा में उत्पादित सुगंधित चावल में रुचि जताई थी। इसके बाद प्रशासनिक पहल के तहत न केवल चावल बल्कि उसके बीज भी पार्सल के माध्यम से भेजे गए। स्थानीय स्तर पर इस पहल को सराहना मिल रही है क्योंकि इससे दूरस्थ क्षेत्रों के बीच कृषि उत्पादों का सीधा जुड़ाव स्थापित हुआ है।
लैलूंगा क्षेत्र में पांच किसान उत्पादक संगठन के माध्यम से संगठित हो रही ‘जवाफूल’ चावल की खेती, एक हजार से अधिक किसान जुड़े
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार लैलूंगा क्षेत्र में सुगंधित ‘जवाफूल’ धान की खेती को संगठित रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए पांच किसान उत्पादक संगठन गठित किए गए हैं, जिनसे एक हजार से अधिक किसान जुड़े हुए हैं। ये किसान सामूहिक रूप से उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन की दिशा में कार्य कर रहे हैं। विभाग द्वारा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि हो रही है।
तकनीकी मार्गदर्शन और एफपीओ मॉडल से बढ़ रहा उत्पादन, सोशल मीडिया के जरिए भी किया जा रहा प्रचार प्रसार
प्रशासन के निर्देश पर कृषि विभाग लगातार इस फसल को बढ़ावा देने में जुटा है। किसान समूहों और एफपीओ मॉडल के माध्यम से उत्पादन और विपणन को व्यवस्थित किया जा रहा है। इसके साथ ही ‘जवाफूल’ चावल के प्रचार प्रसार के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल का भी उपयोग किया जा रहा है, जिससे इसकी पहचान राज्य से बाहर भी तेजी से बढ़ रही है।
छत्तीसगढ़ से बाहर बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना और लद्दाख तक बढ़ी मांग, किसानों की आय और क्षेत्रीय पहचान दोनों को मिल रहा लाभ
‘केलो’ जैविक जवाफूल चावल अब केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी मांग बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना सहित लद्दाख और कारगिल जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी देखी जा रही है। प्राकृतिक सुगंध और स्वाद के कारण इस चावल की लोकप्रियता बढ़ रही है। इससे जहां किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं, वहीं लैलूंगा क्षेत्र की कृषि पहचान को भी नई मजबूती मिली है।
