NTPC सीपत रोजगार विवाद: 2008 के आदेशों का पालन क्यों नहीं हुआ? तत्कालीन एसडीएम और वर्तमान कलेक्टर संजय अग्रवाल की भूमिका पर उठे सवाल

भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार और वरिष्ठता सूची में कथित गड़बड़ी का मामला मुख्य सचिव तक पहुंचा; कलेक्टर कार्यालय ने निष्पक्ष जांच के लिए संभागायुक्त को लिखा था पत्र, 15 दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश के बाद भी जांच की स्थिति पर सवाल

अनिल शुक्ला की रिपोर्ट

बिलासपुर। NTPC सीपत में भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार देने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर प्रश्न बन गया है। वर्ष 2008 में तैयार वरिष्ठता सूची, रोजगार संबंधी आदेशों और उनके कथित अनुपालन को लेकर शिकायतकर्ता भगत सिंह राठौर ने तत्कालीन एसडीएम संजय अग्रवाल की भूमिका की जांच की मांग की है। संजय अग्रवाल वर्तमान में बिलासपुर कलेक्टर हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि रोजगार देने की प्रक्रिया में पात्रता और वरिष्ठता सूची से संबंधित अनियमितताओं के कारण वास्तविक पात्र हितग्राही रोजगार से वंचित रह गए, जबकि कुछ अन्य लोगों को कथित रूप से अनुचित लाभ मिला।

इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि वर्ष 2008 में रोजगार देने के संबंध में प्रशासनिक आदेश जारी किए गए थे, तो उनका पालन किस स्तर पर और किस प्रकार हुआ? यदि आदेशों का पालन नहीं हुआ, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन था? और अब जब इसी अवधि के प्रशासनिक निर्णयों की जांच की मांग उठ रही है, तो जांच की प्रगति और निष्कर्षों की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं है?

तत्कालीन एसडीएम संजय अग्रवाल की भूमिका जांच के दायरे में लाने की मांग

शिकायतकर्ता के अनुसार, वर्ष 2008 में NTPC सीपत में भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार देने के लिए वरिष्ठता सूची तैयार की गई थी। आरोप है कि एक एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहित होने वाले कुछ प्रभावित परिवारों को निर्धारित अवधि में रोजगार देने के लिए सूची बनाई गई थी, लेकिन कई पात्र लोगों को नौकरी नहीं मिली।

इसके विपरीत, शिकायत में आरोप लगाया गया है कि एक एकड़ से कम भूमि अधिग्रहित होने वाले कुछ लोगों को अधिक भूमि अधिग्रहण दर्शाकर वरिष्ठता सूची में शामिल किया गया और उन्हें रोजगार का लाभ मिला।

शिकायतकर्ता ने तत्कालीन एसडीएम मस्तूरी संजय अग्रवाल की भूमिका की जांच की मांग करते हुए यह सवाल उठाया है कि उस समय तैयार सूची, संबंधित आदेशों और उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी किसकी थी। उनका कहना है कि पूरे मामले में मूल अभिलेखों की जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वरिष्ठता सूची किस आधार पर तैयार हुई, पात्रता का निर्धारण कैसे किया गया और संबंधित निर्देशों का पालन क्यों नहीं हुआ।

हालांकि, किसी अधिकारी द्वारा जानबूझकर अनियमितता किए जाने या किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाने की पुष्टि अभी उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं होती। इसके लिए मूल आदेशों, वरिष्ठता सूची, रोजगार संबंधी अभिलेखों और जांच निष्कर्षों का परीक्षण आवश्यक है।

वर्तमान कलेक्टर के सामने निष्पक्ष जांच की प्रशासनिक चुनौती

इस मामले में प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिकायत में तत्कालीन एसडीएम मस्तूरी के कार्यकाल से संबंधित निर्णयों की जांच की मांग की गई है, जबकि संजय अग्रवाल वर्तमान में बिलासपुर कलेक्टर हैं।

कलेक्टर कार्यालय ने 5 अगस्त 2026 को ज्ञापन क्रमांक 1670/ई-गवर्नेंस/सीएम हेल्पलाइन/2026 के माध्यम से संभागायुक्त को पत्र भेजा था। इसमें स्पष्ट किया गया कि शिकायत वर्तमान कलेक्टर की पूर्व पदस्थापना से संबंधित तथ्यों पर आधारित है। ऐसे में निष्पक्षता, पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए संभागायुक्त स्तर से स्वतंत्र जांच दल गठित कराना उचित होगा।

यह पत्र प्रशासनिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे स्पष्ट होता है कि कलेक्टर कार्यालय ने मामले की जांच अपने स्तर पर कराने के बजाय संभागायुक्त से स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध किया था।

अब जवाबदेही के लिहाज से यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि तत्कालीन एसडीएम के कार्यकाल में जारी आदेशों का वास्तविक स्वरूप क्या था, उनका पालन किन अधिकारियों या विभागों को करना था और यदि आदेशों का पालन नहीं हुआ तो इसके लिए किस स्तर पर जिम्मेदारी निर्धारित होती है।

एसडीएम मस्तूरी ने भी की थी जांच दल गठित करने की अनुशंसा

इससे पहले 31 जुलाई 2026 को एसडीएम मस्तूरी ने कलेक्टर बिलासपुर को पत्र लिखकर शिकायत की जांच के लिए सक्षम अधिकारी स्तर पर जांच दल गठित करने की अनुशंसा की थी।

पत्र में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन शिकायत क्रमांक WP260700118312 का उल्लेख करते हुए भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार देने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच कराने की आवश्यकता बताई गई थी।

इसके बाद 5 अगस्त को कलेक्टर कार्यालय ने संभागायुक्त से स्वतंत्र जांच दल गठित करने का अनुरोध किया। इस क्रम से स्पष्ट है कि शिकायत को प्रशासनिक स्तर पर जांच के लिए आगे बढ़ाया गया था। लेकिन जांच के लिए पत्राचार और समिति गठन अपने आप में आरोपों की पुष्टि नहीं करते। वास्तविक स्थिति जांच प्रतिवेदन और संबंधित अभिलेखों से ही स्पष्ट होगी।

चार सदस्यीय जांच समिति बनी, 15 दिन में रिपोर्ट देने के थे निर्देश

संभागायुक्त कार्यालय ने 24 अगस्त 2026 को चार सदस्यीय जांच समिति गठित की थी। समिति में हरिशंकर चौहान, उपायुक्त (विकास), डॉ. स्मृति तिवारी, उपायुक्त (राजस्व), विजय कुमार पटेल, स्टेनोग्राफर वर्ग-1 और कु. काजल मेघाम, सहायक ग्रेड-3 को शामिल किया गया।

आदेश के अनुसार, समिति को शिकायत के सभी बिंदुओं का परीक्षण कर 15 दिनों के भीतर तथ्यात्मक जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था।

शिकायतकर्ता भगत सिंह राठौर का कहना है कि निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बावजूद उन्हें जांच रिपोर्ट और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं बताई गई। उन्होंने इसी मुद्दे को उठाते हुए मुख्य सचिव को शिकायत भेजकर निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

इस बिंदु पर संभागायुक्त कार्यालय से यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि समिति ने जांच पूरी की या नहीं, प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया या नहीं और यदि रिपोर्ट लंबित है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं।

आरटीआई में जांच प्रक्रियाधीन होने की जानकारी मिलने का दावा

शिकायतकर्ता के मुताबिक, सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर उन्हें प्रकरण जांच प्रक्रियाधीन होने की जानकारी दी जा रही है। उन्होंने 9 सितंबर 2026 को दिए गए अपने कथन में भी मामले की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का मुद्दा उठाया था।

यदि निर्धारित समयसीमा में जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं हुई है, तो विलंब का कारण और वर्तमान स्थिति सामने आनी चाहिए। वहीं, यदि रिपोर्ट तैयार हो चुकी है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उसके आधार पर आगे क्या कार्रवाई की गई।

मुख्य सचिव से शिकायत के बाद अब तीन प्रमुख सवाल

इस मामले में अब शासन और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से तीन प्रमुख सवालों के जवाब अपेक्षित हैं।

पहला—2008 में क्या आदेश जारी हुए थे? रोजगार संबंधी वरिष्ठता सूची तैयार करने के नियम, पात्रता के आधार और संबंधित आदेशों की वास्तविक स्थिति क्या थी? क्या उन आदेशों का पालन हुआ और यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी थी?

दूसरा—तत्कालीन एसडीएम संजय अग्रवाल की क्या भूमिका थी? शिकायतकर्ता ने उनके कार्यकाल से जुड़े निर्णयों की जांच की मांग की है। ऐसे में संबंधित फाइलों, आदेशों, वरिष्ठता सूची और रोजगार आवंटन के अभिलेखों के आधार पर उनकी प्रशासनिक भूमिका स्पष्ट की जानी चाहिए। केवल पद पर रहने के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन निर्णयों और उनके क्रियान्वयन की जांच जरूरी है।

तीसरा—15 दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश के बाद क्या हुआ? जांच समिति की वर्तमान स्थिति, रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने की तारीख और उसके आधार पर की गई कार्रवाई स्पष्ट की जानी चाहिए। यदि रिपोर्ट लंबित है, तो विलंब के कारण भी सामने आने चाहिए।

प्रभावित परिवारों को जवाब और प्रशासन को जवाबदेही देनी होगी

NTPC सीपत रोजगार विवाद अब केवल वरिष्ठता सूची में कथित अनियमितताओं की शिकायत तक सीमित नहीं है। यह भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों को रोजगार देने की प्रक्रिया, प्रशासनिक आदेशों के अनुपालन और शिकायतों के समयबद्ध निराकरण से जुड़ा मामला है।

शिकायतकर्ता भगत सिंह राठौर ने मुख्य सचिव से निष्पक्ष जांच कराकर तथ्य सामने लाने और अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह वर्ष 2008 के मूल अभिलेखों से लेकर वर्ष 2026 में गठित जांच समिति की कार्रवाई तक पूरी प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट करे। यदि आदेशों का पालन नहीं हुआ, तो क्यों नहीं हुआ? यदि पात्र हितग्राही रोजगार से वंचित रहे, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? और यदि जांच के लिए 15 दिन की समयसीमा निर्धारित की गई थी, तो उसके बाद रिपोर्ट की स्थिति क्या है?

इन सवालों के तथ्यात्मक जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि रोजगार प्रक्रिया में वास्तव में अनियमितताएं हुई थीं या नहीं और प्रशासनिक स्तर पर किसकी क्या जिम्मेदारी बनती है।

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