RTE एडमिशन पर हाईकोर्ट सख्त, पूछा- क्या बड़े स्कूलों में पढ़ना नहीं चाहते गरीब बच्चे?

बिलासपुर, 8 मई 2026: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत पहली कक्षा में प्रवेश प्रक्रिया को लेकर राज्य शासन पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने हैरानी व्यक्त करते हुए पूछा कि क्या गरीब बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ना नहीं चाहते या फिर राज्य सरकार कुछ तथ्य छिपा रही है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने राज्य शासन को 10 जुलाई तक शपथ पत्र के साथ विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।


387 स्कूलों में नहीं आया एक भी आवेदन

दरअसल, शिक्षा के अधिकार कानून को लेकर दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश शपथ पत्र में बताया गया कि प्रदेश के 387 स्कूलों में एडमिशन के लिए एक भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है।

इसके अलावा 366 ऐसे स्कूल हैं, जहां उपलब्ध सीटों की तुलना में आवेदन काफी कम आए हैं। इन स्कूलों में प्रदेश के कई बड़े निजी स्कूल भी शामिल हैं।


हाईकोर्ट ने उठाए कई अहम सवाल

राज्य सरकार के जवाब पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा कि आखिर गरीब बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ना क्यों नहीं चाहेंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राज्य सरकार पूरी जानकारी सामने नहीं रख रही है।

डिवीजन बेंच ने सरकार को निर्देश दिया है कि RTE के तहत आवंटित सीटों की पूरी जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए। साथ ही यह भी बताया जाए कि किस स्कूल में कितनी सीटें निर्धारित थीं और किन बच्चों को प्रवेश मिला है।


“लापरवाही से प्रभावित होगा हजारों बच्चों का भविष्य”

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रवेश प्रक्रिया में हो रही देरी पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि जब नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, तो गरीब बच्चों का दाखिला आखिर कब तक होगा।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रवेश प्रक्रिया में इसी तरह देरी होती रही, तो हजारों बच्चों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।


कम एडमिशन पर भी कोर्ट ने जताई आपत्ति

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि कई स्कूलों में केवल एक या दो बच्चों के एडमिशन की जानकारी दी गई है। कोर्ट ने पूछा कि यदि किसी स्कूल में केवल एक बच्चे को प्रवेश मिला है, तो क्या वहां कुल चार ही छात्र पढ़ रहे हैं।

गौरतलब है कि RTE कानून के तहत निजी स्कूलों में कुल सीटों के 25 प्रतिशत हिस्से पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है।

Back to top button