
नई दिल्लीः कश्मीर में कभी पंडितों का कई मोहल्ला हुआ करता था. 1990 में एक-एक कर कश्मीरी पंडितों को वहां से भगा दिया गया. फिल्म निर्देश विवेक अग्निहोत्री की The Kashmir Files ने इस हकीकत को हूबहू बयां किया है. ये हम नहीं कह रहे, बल्कि वो लोग कह रहे जिन्होंने ये दर्द देखा और सहा है. फिल्म रिलीज होने के साथ ही पूरे दुनिया में सर्खियों में छाई हुई है. फिल्म देखने के बाद भावुक हुए कश्मीरी पंडितों ने अपना दर्द ZEE NEWS के साथ साझा किया है. आइये आपको बताते हैं इन लोगों के बेइंतहा दर्द से भरी कहानी के बारे में.
32 साल पुराना जख्म हुआ हरा
32 साल पहले अपने घर को छोड़ के निकले कश्मीरी हिंदुओं ने पिछले 32 साल किन संघर्षों को झेला, ये एक अलग ही कहानी है. पर अब शायद उनके जीवन मे कुछ उम्मीद बढ़ती नजर आ रही है. जब जम्मू-कश्मीर की सरकार उन जगहों पर पहुंच रही है, जहां-जहां ये विस्थापित मौजूद हैं. कोशिश है उन्हें एक पहचान देंने की, यानी डोमिसाइल सर्टिफिकेट देने की.
कश्मीर ही उनका असली घर
बेंगलुरु में ऐसे विस्थापित परिवारों की संख्या 500 के आसपास है. पिछले 5 दिनों से यहां कैम्प चलाया जा रहा है, जिसमें अब तक 700 लोगों का रेजिस्ट्रेशन हो चुका है और अगले तीन चार दिनों में बाकी लोग भी इसमे शामिल हो जाएंगे. इन लोगों में वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने विस्थापन के इस दंश को झेला है. वो युवा भी शामिल हैं, जिन्होंने कश्मीर को कभी देखा नहीं, पर ये जानते हैं कि वो कश्मीर से आए हैं. कश्मीर ही उनका असली घर है. ऐसे में ये सर्टिफिकेट उनके लिये उम्मीद की वो किरण है जो, आज नहीं तो कल उनको उनके घर ले जा सकती है. जो पहचान वो 32 साल पहले खो चुके थे वो पहचान आज उनको फिर वापस मिल रही है.
ये लड़ाई अभी लंबी चलेगी
The Kashmir Files के रिलीज होते ही देश उस सच को जान रहा है, जो इन कश्मीरी हिंदुओं ने झेला. ये भी सच है कि ये लड़ाई अभी लंबी चलेगी लेकिन, इन हिंदुओं ने हिम्मत नहीं हारी है. कई उम्र के उस दौर से गुजर रहे हैं, जंहा ये नहीं पता कि कब जिंदगी की शाम हो जाए. लेकिन इस सर्टिफिकेट के बाद वो ना सही पर उनकी आगे की नस्ल अपनी जमीन पर वापस लौट सकेगी.
कश्मीरी पंडितों की दर्दभरी आपबीती
1990 में कश्मीरी हिंदुओ को किस तरह उनके घरों से बेघर किया गया? क्या साजिश थी? किस तरह का माहौल बनाया गया? आइये आपको बताते हैं उनकी दर्दभरी आपबीती के बारे में. जम्मू के विस्थापित कैम्प जगती में कई विस्थापित कश्मीरी हिन्दू रह रहे हैं. यहां हमारी टीम ने शादी लाल पंडिता, दलीप पंडिता, प्यारे लाल पंडिता और कश्मीर पंडित कुलदीप से बात की.
हर एक मौत दर्दनाक थी
कुलदीप ने बताया कि वो रैनावारी श्रीनगर में रहते थे. उन्होंने बताया कि 19 जनवरी 1990 की रात काली रात थी. आज भी वो आवाजें कानों में गूंजती हैं. एक साथ डरा देने वाले नारे सुनाई दे रहे थे. कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? प्यार-मोहब्बत से रहने वाले लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए थे. अचानक ये खौफनाक मंजर शुरू हुआ और कई मौतें हो गईं. हर एक मौत दर्दनाक थी.
कश्मीर छूटते ही जिंदगी कठिन हो गई
फिल्म का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज ये पहली बार हुआ है कि किसी ने इतनी जबरदस्त हिम्मत दिखाई है. इसको स्क्रीन पर दिखाने की हिम्मत दिखाई है. हम तो लोगों को बताने में असफल रहे कि हमारे साथ क्या हुआ. कश्मीर से निकलने के बाद जिंदगी बहुत कठोर हो गई.
मां-बाप को खून के आंसू रोते देखा
कुलदीप ने बताया कि इस घटना के वक्त वो 20 साल के थे. ग्रैजुएशन बस की ही थी. जम्मू में क्लाइमेट अलग था. उन्हें पता ही नहीं था कि कूलर क्या होता है? फ्रिज क्या है? उन्होंने बताया कि वो अपने मां-बाप को खून के आंसू रोते देखते थे. उन लोगों ने सालों की मेहनत से घर बसाया था. अचानक बोला गया, ‘भाग जाओ यहां से’.
कोई मदद करने वाला नहीं था
उन्होंने बताया कि कोई मदद करने वाला नहीं था. कुलदीप कहते हैं कि उस वक्त होम मिनिस्टर थे महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद थे. वो क्या कर रहे थे, सबको पता है. किसी ने हमारी फरियाद नहीं सुनी. हम अपनी कौम के नरसंहार को बताने में असफल रहे. फिल्म का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विवेक अग्निहोत्री जी ने बॉलिवुड से पंगा ले लिया है. एक-एक कश्मीरी पंडित उनके साथ हैं. एक-एक घटना सत्य है.




