
रायपुर। छत्तीसगढ़ में इन दिनों छत्तीसगढ़ महतारी की मूर्ति क्षतिग्रस्त होने और उसके बाद दिए गए विवादित बयानों को लेकर अस्मिता की नई बहस गहराती जा रही है। घटना के बाद विभिन्न संगठनों और समुदायों में आक्रोश देखने को मिला और कई स्थानों पर बंद जैसी स्थिति बन गई। मामला अब केवल एक विरोध या बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश की स्थानीय पहचान और सामाजिक समरसता के सवाल से जुड़ गया है।
विवाद उस समय और बढ़ गया जब स्थानीय नेता अमित बघेल द्वारा अग्रसेन महाराज, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी की गई। इस बयान को विभिन्न समाजों ने भावनाओं को आहत करने वाला बताया।
अग्रवाल समाज की प्रीति अग्रवाल ने इसे समाज में असंतोष और विभाजन फैलाने का प्रयास करार दिया। वहीं सिंधी समाज के सलाहकार अमित चिमनानी ने कहा कि “सिंधी समाज ने हर संकट में छत्तीसगढ़ की मिट्टी के प्रति अपना प्रेम साबित किया है—चाहे कोविड महामारी रही हो या हाल के रेल हादसे। छत्तीसगढ़ महतारी हमारी भी मां है।” उनका यह वक्तव्य इस बात को रेखांकित करता है कि अस्मिता किसी एक समाज की निजी संपत्ति नहीं होती, बल्कि यह सभी की साझा धरोहर है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय पहचान का सवाल केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों में समय-समय पर अलग रूपों में उभरता रहा है। जब अस्मिता सम्मान से हटकर राजनीतिक हथियार बन जाती है, तब वह सामाजिक सौहार्द और एकता के लिए खतरा पैदा करती है।
छत्तीसगढ़ एक युवा राज्य है, जहां हर समाज ने विकास और संस्कृति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह मिट्टी जल-जंगल-जमीन के साथ जन की धरती भी है, जहां विविधता और सहअस्तित्व इसकी पहचान रहे हैं।
आज आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ महतारी को विभाजन नहीं, समरसता का प्रतीक माना जाए।
अस्मिता का सम्मान तभी सार्थक होगा जब उसमें हर समुदाय और हर व्यक्ति के लिए जगह हो।
छत्तीसगढ़ को आज अस्मिता की राजनीति नहीं, अस्मिता का सम्मान चाहिए—
ताकि यह धरती अपनी परंपरागत एकता, संवेदनशीलता और भाईचारे की पहचान बनाए रख सके।



