धरमजयगढ़ वन मंडल में हाथी शावकों की मौत का रहस्य हर साल तालाब में ही क्यों डूब रहे नन्हे हाथी?
रायगढ़/ भीमसेन तिवारी, संपादक ‘आपकी आवाज’
रायगढ़। रायगढ़/ धरमजयगढ़ वन मंडल से सामने आई हाथी शावक की मौत की एक घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि करीब एक महीने से भी कम उम्र का हाथी शावक, जो ठीक से चलने की स्थिति में भी नहीं था, तालाब में डूब गया। सवाल यह है कि आखिर इतना छोटा शावक तालाब तक कैसे पहुंचा और उसकी मौत डूबने से कैसे हुई?
वन्यजीवों के व्यवहार को समझने वाले लोगों के अनुसार आमतौर पर हाथियों का झुंड अपने छोटे बच्चों को लेकर बेहद सतर्क रहता है। ऐसे में किसी बेहद छोटे शावक का तालाब में डूब जाना अपने आप में जांच का विषय बन जाता है। खासकर तब, जब इसी तरह की घटनाएं पिछले दो-तीन वर्षों से लगातार सामने आने की बात कही जा रही है।
करीब 50 हाथियों का झुंड और फिर एक शावक की मौत
क्षेत्र के वनकर्मियों से मिली जानकारी के अनुसार करीब 50 हाथियों का दल क्षेत्र में विचरण कर रहा था। इसी झुंड में शामिल एक शावक की तालाब में डूबने से मौत होने की बात सामने आई है।
मृत शावक के सैंपल जांच के लिए बरेली और जबलपुर की पैथोलॉजी लैब में भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है। रिपोर्ट में मौत का वास्तविक कारण क्या सामने आता है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि यह केवल एक सामान्य दुर्घटना है तो पिछले दो-तीन वर्षों में इसी तरह के हाथी समूह से जुड़े शावकों की तालाब में डूबने की घटनाएं लगातार क्यों सामने आ रही हैं?
यह महज संयोग हो सकता है, लेकिन लगातार एक जैसी घटनाओं को देखते हुए वन विभाग के सामने इसका वैज्ञानिक अध्ययन कराने की आवश्यकता जरूर दिखाई देती है।
क्या शावक की मौत महज दुर्घटना है?
हाथियों के व्यवहार पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि इतने छोटे शावक की सुरक्षा आमतौर पर झुंड के बड़े हाथियों द्वारा की जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि घटना के समय शावक की मां और झुंड के अन्य हाथी कहां थे और उनकी प्रतिक्रिया क्या थी।
क्या शावक अकेला तालाब तक पहुंच गया था?
क्या वह पानी में फंस गया था?
क्या झुंड के किसी हाथी ने उसे बचाने का प्रयास किया?
या फिर घटना के पीछे हाथियों के झुंड के व्यवहार से जुड़ा कोई ऐसा पहलू है, जिसे अभी तक समझा नहीं जा सका है?
इन सवालों का जवाब वैज्ञानिक जांच और मौके की परिस्थितियों के विश्लेषण से ही मिल सकता है।
क्या बदल रहा है हाथियों का व्यवहार?
वन्यजीव विशेषज्ञों के बीच यह विषय भी चर्चा का कारण बन रहा है कि लगातार घटते वन क्षेत्र, जंगलों का विखंडन, मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव और हाथियों के प्राकृतिक आवास में बदलाव उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं या नहीं।
रायगढ़ जिले में कई स्थानों पर जंगल खंड-खंड होने, औद्योगिक गतिविधियों, खनन, पेड़ों की कटाई तथा फ्लाई ऐश जैसी गतिविधियों को लेकर लंबे समय से पर्यावरणीय चिंताएं उठती रही हैं। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या हाथियों के प्राकृतिक आवास में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप उनके विचरण और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर रहा है?
हालांकि किसी शावक की मौत को सीधे इन कारणों से जोड़ना वैज्ञानिक प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा। इसलिए इस दिशा में व्यवस्थित अध्ययन की जरूरत है।
धरमजयगढ़ की घटना ने भी बढ़ाए सवाल
इसी बीच धरमजयगढ़ वन मंडल से जुड़ी एक अन्य घटना का भी उल्लेख किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार कुछ समय पहले हाथियों के झुंड से अलग हुआ एक नन्हा शावक भैंसों के झुंड के बीच पहुंच गया था।
वनकर्मियों को जानकारी मिलने के बाद शावक को उसके मूल हाथी झुंड और मां से मिलाने का प्रयास किया गया। बताया जाता है कि कई प्रयासों के बावजूद शावक और झुंड के बीच अपेक्षित सामंजस्य नहीं बन पाया। इसके बाद उच्च अधिकारियों के निर्देश पर शावक को सरगुजा स्थित रामकोला हाथी रेस्क्यू सेंटर भेजे जाने की जानकारी है।
यदि यह जानकारी सही है तो यह घटना भी हाथियों के सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए अध्ययन का विषय बन सकती है। हालांकि इसे सीधे ‘द्वेष’ या ‘चिड़चिड़ापन’ कहना वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं होगा। इसके पीछे शावक की उम्र, गंध की पहचान, झुंड से बिछड़ना, तनाव, मातृ-व्यवहार अथवा अन्य प्राकृतिक कारण हो सकते हैं।
रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडल के सामने बड़ा सवाल
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं को देखते हुए वन विभाग को केवल प्रत्येक घटना का पोस्टमार्टम और सैंपल जांच तक सीमित रहने के बजाय घटनाओं के पैटर्न का वैज्ञानिक अध्ययन कराने पर भी विचार करना चाहिए।
फील्ड बायोलॉजिस्ट और हाथी व्यवहार विशेषज्ञों की टीम यदि प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन करे तो कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मिल सकते हैं –
क्या एक ही हाथी दल में लगातार शावकों की मौत हो रही है?
क्या घटनाएं किसी विशेष मौसम या स्थान पर अधिक होती हैं?
क्या सभी घटनाओं में तालाब या जलस्रोत की भूमिका समान है?
घटना के समय शावक की मां और झुंड का व्यवहार कैसा था?
क्या मानव गतिविधियों और हाथियों के विचरण क्षेत्र में कोई संबंध दिखाई देता है?
क्या जंगल के विखंडन और हाथियों के व्यवहार में कोई संबंध है?
असली कारण सामने आना जरूरी
हाथी शावक की मौत को केवल एक दुर्घटना मानकर मामला समाप्त कर देना शायद पर्याप्त नहीं होगा, खासकर तब जब पिछले वर्षों में भी इसी प्रकार की घटनाओं का दावा किया जा रहा है।
यदि जांच में यह सामान्य दुर्घटना साबित होती है तो भी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। लेकिन यदि घटनाओं के पीछे कोई पर्यावरणीय, व्यवहारगत या मानवीय कारण सामने आता है, तो उसके समाधान के लिए समय रहते कदम उठाए जा सकेंगे।
वन्यजीव संरक्षण केवल जंगल और हाथियों की संख्या बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके प्राकृतिक व्यवहार और सुरक्षित आवास को समझना भी उतना ही जरूरी है।
रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडल में हाथियों से जुड़ी ऐसी घटनाओं का स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक अध्ययन अब इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, ताकि यह पता चल सके कि आखिर बार-बार नन्हे शावक ही ऐसी घटनाओं का शिकार क्यों हो रहे हैं।

