नाम की योजनाएं काम की लापरवाही सड़कों पर तिल तिल मरता गौवंश सो रहा शासन प्रशासन



कुड़ेकेला:- सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाइट में बेबस चमकती आंखें तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर तड़पता गौवंश और हादसों का शिकार होते बेकसूर वाहन चालक यह किसी डरावनी फिल्म का दृश्य नहीं बल्कि प्रदेश की सड़कों की कड़वी सच्चाई है। प्रदेश में सरकारें बदलीं मुख्यमंत्रियों के चेहरे बदले और गौवंश के नाम पर वादों के नए लिफाफे जारी हुए लेकिन धरातल पर परिस्थितियां जस की तस हैं। जिन्हें माता का दर्जा देकर वोटों की राजनीति साधी जाती है वही आज लावारिस बनकर सड़कों पर बदहाली के आंसू बहा रही हैं।


गौठान से लेकर गौधाम तक योजनाओं का कागजी सफर:-पिछली सरकार के दौरान बड़े गाजे बाजे के साथ हर पंचायत में गौठान योजना शुरू की गई थी। दावा था कि आवारा मवेशियों को आसरा मिलेगा लेकिन सत्ता परिवर्तन होते ही यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई। नई सरकार ने आते ही घोषणा की कि सड़कों पर विचरण कर रहे गौवंश के लिए विशेष कॉरिडोर बनाए जाएंगे जहां उनके चारे पानी और सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम होगा।


समय का पहिया घूमा और सरकार के कार्यकाल के शानदार तीन साल पूरे होने को आए हैं। कॉरिडोर की बात हवा हो गई तो नया शगुफा गौधाम योजना का छोड़ दिया गया। हकीकत यह है कि न तो ग्रामीण इलाकों में कोई गौधाम नजर आ रहा है और न ही शहरी क्षेत्रों में। योजनाएं सिर्फ प्रशासनिक फाइलों और भाषणों तक सीमित होकर रह गई हैं।


सड़कें बनीं डेथ जोन कौन है जिम्मेदार:-आज प्रदेश की हर छोटी बड़ी सड़क और हाईवे गौवंश के लिए डेथ जोन बन चुके हैं।बेजुबानों की बलि आए दिन तेज रफ्तार गाड़ियां गौवंश को कुचलती हुई निकल जाती हैं। कई बेजुबान मौके पर ही दम तोड़ देते हैं तो कई हफ्तों तक लहूलुहान होकर तड़पते रहते हैं।


चालकों पर काल का साया:- अंधेरे में सड़क के बीचों बीच बैठे मवेशी बाइक और कार सवारों के लिए काल साबित हो रहे हैं। रोजाना दर्जनों लोग हादसों में गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं या अपनी जान गंवा रहे हैं।


आखिर कब जागेगा सिस्टम:-करोड़ों रुपये का बजट बड़ी-बड़ी बैठकें और दावों की लंबी फेहरिस्त के बावजूद अगर गौवंश भूखा प्यासा सड़कों पर मरने के लिए मजबूर है तो सवाल उठना लाजिमी है। आखिर योजनाएं शुरू होने से पहले ही दम क्यों तोड़ देती हैं। क्या सरकार सिर्फ चुनाव और भाषणों के वक्त ही गौ सेवा की बात याद रखेगी जनता और सड़कों पर तड़पते बेजुबान आज यही सवाल पूछ रहे हैं आखिर कब जागेगा यह बेफिक्र सिस्टम।

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