
भगवान बिरसा मुंडा की सच्ची विरासत को छुपाने के पीछे की क्या है साजिश?
जानने के लिए पढ़िए यह रिपोर्ट
( भगवान बिरसा मुंडा की तस्वीर )
हर साल बिरसा मुंडा जी की जयंती नवंबर 9 को पूरे भारत मे मनाई जाती है। बिरसा मुंडा जी (1875-1900) को आदिवासी समाज मे उनके अनुयायियों द्वारा धरती आबा कह कर भी पुकारा जाता है। कई वामपंथी और चर्च , बिरसा मुंडा जी के बौद्धिक उत्तराधिकारी बन कर उनके कार्यों को हड़पने की कोशिश करते हैं। चर्च एवं वामपंथी उनकी विरासत को अपनी निजी विरासत बताने का प्रयास करते हैं और आदिवासियों को गैर-हिंदुओं के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश करते हैं । वे आसानी से इस तथ्य को छुपाने की कोशिश करते हैं कि भगवान बिरसा मुंडा, जो शुरू में एक मिशनरी स्कूल में शिक्षित हुए, बाद में चर्च और ईसाई धर्म से मोह भंग होने पर उनसे दूर हो गए । बताया जाता है कि भगवान बिरसा मुंडा जेल में कोलेरा की वजह से मरे। पर सच तो यह है कि भगवान बिरसा मुंडा वास्तव में अंग्रेजों द्वारा मारे गए थे क्योंकि वे आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म के प्रसार के लिए खतरा बन चुके थे और उन्होंने चर्च द्वारा आदिवासियों के शोषण को चुनौती दी थी ।
विडंबना यह है कि आज उनकी हत्या के लिए जिम्मेदार ताकतें भगवान बिरसा मुंडा की विरासत के ध्वजवाहक के रूप में खुद को पेश करके उनकी विरासत को हथियाने और आदिवासियों को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही हैं।
ऐसा करने में वे आसानी से इस तथ्य को छिपाते हैं कि एक वैष्णव प्रचारक, आनंद पंते ने ईसाई धर्म को त्यागने के बाद भगवान बिरसा को सलाह दी थी की चर्च के पादरी किसी धार्मिक भावना के तहत नही बल्कि अपने स्वार्थ और धर्म के प्रचार के लिए आदिवासियों और गरीब लोगों को प्रलोभन देने का काम कर रहे हैं । भगवान बिरसा ने भगवद गीता, रामायण और महाभारत भी पढ़ी थी, जिससे उनका आध्यात्मिक परिवर्तन हुआ । उनके अनुयायियों ने उन्हें भगवान के ‘अवतार’ के रूप में देखा, जो सनातन धर्म की एक गहन विशेषता है ।
भगवान बिरसा मुंडा पर गोपी कृष्ण कुंवर द्वारा एक किताब लिखी गयी जिसका नाम था लाइफ एंड टाइम्स ऑफ बिरसा मुंडा। इस किताब में यह बताया गया कि उन्होंने 1899 के विद्रोह से पहले रांची के पास जगन्नाथ मंदिर में प्रार्थना की थी। 1895 में उन्होंने बिरसाइत नामक एक धार्मिक आंदोलन / संप्रदाय की शुरुआत की जिसमें सनातन धर्म के साथ कई समानताएं थीं (इसे सनातन धर्म के कई संप्रदायों में से एक भी माना जा सकता है) और भगवान बिरसा अक्सर महाभारत और रामायण से बिरसाइत धर्म के लिए प्रेरणा लेते नज़र आते थे। अपने सनातनी वंश के स्पष्ट प्रतिबिंब में उन्होंने आदिवासियों को ईसाई धर्म छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। मांस, शराब, खैनी, बीडी का सेवन प्रतिबंधित किया। गोहत्या पर प्रतिबंध की बात की, मितव्ययी जीवन जीने की अपील की , जादू टोना का विरोध किया और जनेऊ धारण करने का आह्वान किया। आज आधुनिक समय में ना जाने कितने ही लोग अपने निहित स्वार्थ को आगे बढ़ाने के लिए भगवान बिरसा के नाम का उपयोग करते हैं। पर देखने वाली बात ये है कि कितने लोग भगवान बिरसा के वचनों का अनुसरण करने के इच्छुक हैं? सनातन धर्म के साथ भगवान बिरसा के घनिष्ठ संबंध को छिपाकर ना जाने वामपंथी और चर्च क्या हासिल करना चाहते हैं ।
आदिवासी विरोधी ताकतें अपनी रणनीति के एक हिस्से के रूप में आदिवासियों को सनातन धर्म से अलग बता कर उनमे धर्म परिवर्तन कर उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं।वे यह प्रयास करते हैं कि आदिवासियों को उनके सनातनी धार्मिक एवं सामाजिक जड़ों से दूर करके उनका धर्म परिवर्तन किया जा सके। भारतीय आदिवासियों को इस साजिश को समझना और नाकाम करना होगा ।यदि आदिवासी सनातन न होते तो भगवान बिरसा के जीवन मे सनातन धर्म के इतने अवशेष न मिलते । आदिवासियों को अपने मूल को पहचान के भगवान बिरसा के पद चिन्हों पर चलने का प्रयास करना चाहिए और बाहरी शक्तियों के षड्यंत्र को उजागर करना चाहिये। यही भगवान बिरसा मुंडा की असली विरासत है और इन विचारों को ले कर आगे चलने वाले को ही भगवान बिरसा का उत्तराधिकारी कहलाने का अवसर मिलना चहिये।




