
केलो नदी को दूषित करने वाले सिंघल स्टील की एक और यूनिट पर विरोध तेज, 6 जुलाई को होगी जनसुनवाई
रायगढ़। जिले के पतरापाली, कोतरलिया और सियारपाली क्षेत्र में मेसर्स सिंघल स्टील प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित विशाल ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट को लेकर ग्रामीणों में भारी विरोध और आक्रोश देखने को मिल रहा है। केलो नदी को प्रदूषित करने के आरोपों से पहले ही विवादों में रहे सिंघल स्टील की एक और यूनिट स्थापना की तैयारी को लेकर आसपास के गांवों में चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि नया प्लांट लगने से खेती, जल स्रोत और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ेगा।
कंपनी द्वारा पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल में आवेदन किया गया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 14 सितंबर 2006 की अधिसूचना के तहत इस परियोजना की लोक सुनवाई 6 जुलाई 2026, सोमवार को आयोजित की जाएगी। जनसुनवाई सुबह 11 बजे स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिन्दी माध्यम विद्यालय पतरापाली (पूर्व) के सामने मैदान में होगी।
प्रस्तावित परियोजना में 17 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता का आयरन कंसंट्रेट आधारित एकीकृत स्टील प्लांट स्थापित किया जाना है। इसके साथ 12 लाख टीपीए का पेलेट प्लांट, 6 लाख टीपीए की कोल वाशरी, ऑक्सीजन-नाइट्रोजन प्लांट, कोल गैसीफायर और ब्रिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी प्रस्तावित हैं। साथ ही 160 मेगावाट पावर प्लांट, कोक ओवन और सिंटर प्लांट भी परियोजना का हिस्सा बताए जा रहे हैं।
100 से अधिक उद्योग पहले से, अब और प्रदूषण का डर
ग्रामीणों का कहना है कि रायगढ़ जिला पहले ही भारी औद्योगिक प्रदूषण की मार झेल रहा है। जिले में 100 से अधिक बड़े उद्योग संचालित हैं, जिनसे निकलने वाले धुएं, फ्लाई ऐश और धूल के कारण खेती-बाड़ी प्रभावित हो रही है और लोगों को सांस संबंधी बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। आसपास के 20 गांवों में लोग इस नए प्लांट का विरोध कर रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि नया उद्योग लगने से सल्फर डाइऑक्साइड, कोयले की धूल और प्रदूषण का स्तर और बढ़ जाएगा। उनका कहना है कि रायगढ़ पहले से देश के सबसे प्रदूषित जिलों में गिना जाता है और ऐसे में नए भारी उद्योगों की अनुमति स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा बन सकती है।
खेती और रोजगार को लेकर भी चिंता
प्रस्तावित प्लांट के लिए पतरापाली, कोतरलिया और सियारपाली की बड़ी मात्रा में जमीन प्रभावित होने की आशंका है। यहां के अधिकांश परिवार खेती-किसानी, सब्जी उत्पादन और वन उपज पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में स्थापित उद्योगों में स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार नहीं मिला, केवल अस्थायी मजदूरी तक सीमित रखा गया।
ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि यह परियोजना शुरू हुई तो कई गांवों की उपजाऊ जमीन प्रभावित होगी और लोगों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो जाएगा। वहीं जनसुनवाई को लेकर प्रशासन और कंपनी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं।


