छाल तहसील में एक ही जमीन पर दो अलग-अलग आदेश, पहले नामांतरण खारिज फिर कुछ महीनों बाद मंजूर; राजस्व प्रक्रिया पर उठे सवाल
सिंगीझाप की 1.214 हेक्टेयर भूमि का मामला: पहले शासकीय पट्टा बताकर नामांतरण रोका, बाद में बिना अपील के क्रेता के नाम दर्ज हुई जमीन
कुड़ेकेला। रायगढ़ जिले के छाल तहसील क्षेत्र में एक ही भूमि के नामांतरण को लेकर तहसील न्यायालय के दो अलग-अलग आदेश सामने आने के बाद राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि खसरा नंबर 90/2/ज, रकबा 1.2140 हेक्टेयर भूमि का नामांतरण पहले शासकीय आबंटन पट्टे की जमीन होने के आधार पर खारिज किया गया, लेकिन कुछ महीनों बाद उसी भूमि का नामांतरण क्रेता के पक्ष में मंजूर कर दिया गया।
पहले आदेश में नामांतरण आवेदन कर दिया गया था खारिज
जानकारी के अनुसार, ग्राम सिंगीझाप स्थित उक्त भूमि के नामांतरण के लिए पूर्व में छाल तहसील न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया गया था। सुनवाई के बाद न्यायालय ने आवेदन को खारिज करते हुए आदेश में भूमि को शासकीय आबंटन पट्टे से प्राप्त भूमि बताया था।
आदेश के अनुसार, ऐसी भूमि के क्रय-विक्रय के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक थी। चूंकि संबंधित मामले में ऐसी अनुमति नहीं लिए जाने की बात सामने आई, इसलिए नामांतरण आवेदन को मंजूरी नहीं दी गई।
अपील नहीं हुई, फिर भी कुछ महीनों बाद बदला आदेश
मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि पहले नामांतरण आदेश के खिलाफ कथित तौर पर किसी उच्च राजस्व न्यायालय में अपील नहीं की गई और न ही पूर्व आदेश को किसी सक्षम न्यायालय द्वारा निरस्त किए जाने की जानकारी सामने आई।
इसके बावजूद कुछ महीनों बाद उसी भूमि को लेकर नया नामांतरण प्रकरण चलाया गया। इस बार तहसील न्यायालय ने क्रेता के पक्ष में नामांतरण की अनुमति दे दी। इसके बाद भूमि वर्तमान में हर्ष पटेल पिता टीका राम के नाम दर्ज होने की बात कही जा रही है।
दूसरे आदेश में पहले फैसले का उल्लेख नहीं होने पर सवाल
मामले को लेकर एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बाद में जारी नामांतरण आदेश में पूर्व में नामांतरण खारिज किए जाने वाले आदेश का उल्लेख नहीं होने की बात सामने आई है।
स्थानीय लोगों और मामले से जुड़े जानकारों का आरोप है कि यदि पूर्व आदेश प्रभावी था, तो नए नामांतरण प्रकरण में उसकी जानकारी दर्ज होना जरूरी था। ऐसे में पूर्व आदेश को नजरअंदाज कर दोबारा विपरीत आदेश कैसे पारित हुआ, यह जांच का विषय बताया जा रहा है।
क्या शासकीय पट्टा भूमि के हस्तांतरण के नियमों का पालन हुआ?
मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि भूमि वास्तव में शासकीय आबंटन पट्टे के तहत प्राप्त हुई थी, तो उसके हस्तांतरण और नामांतरण से पहले आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं।
यदि पूर्व अनुमति आवश्यक थी और वह उपलब्ध नहीं थी, तो बाद में नामांतरण स्वीकृत किए जाने की प्रक्रिया की वैधानिकता की जांच किए जाने की मांग उठ रही है।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
एक ही भूमि के संबंध में कुछ ही महीनों के अंतराल में पहले नामांतरण खारिज और बाद में मंजूर किए जाने की स्थिति सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की जा रही है।
लोगों का कहना है कि पूरे प्रकरण में पूर्व आदेश, बाद में प्रस्तुत किए गए दस्तावेज, भूमि की प्रकृति और नामांतरण की प्रक्रिया की जांच की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दोनों आदेशों में इतना बड़ा अंतर किस आधार पर आया।
हालांकि, संबंधित राजस्व अधिकारियों का पक्ष और दूसरे नामांतरण आदेश के आधार अभी सामने नहीं आए हैं। इसलिए लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।











