धनतेरस पर यम दीपदान करते समय बोलें यह मंत्र, जानें दीपक जलाने की सही विधि और धार्मिक महत्व
धर्म डेस्क। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा के साथ यमराज के नाम से दीपदान करने की भी परंपरा है। इसे यम दीपदान या यम दीपम कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाकर यमराज से परिवार की लंबी आयु और सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है।
मान्यता के अनुसार, यम दीपदान करने से परिवार पर अकाल मृत्यु का भय दूर रहता है। इस अवसर पर दीपक जलाते समय एक विशेष मंत्र का जाप भी किया जाता है।
यम दीपदान का मंत्र
धनतेरस की शाम यमराज के नाम से दीपक जलाते समय इस मंत्र का जाप कर सकते हैं—
मंत्र:
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
इसके अलावा दीपक जलाते समय सरल मंत्र ॐ यमाय नमः का जाप भी किया जा सकता है।
इस मंत्र के माध्यम से सूर्यपुत्र यमराज से प्रसन्न होकर परिवार पर कृपा बनाए रखने और सभी सदस्यों की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है।
कैसे करें यम दीपदान?
यम दीपदान के लिए मिट्टी या आटे से बने चौमुखी दीपक का उपयोग करने की परंपरा है। इसे करने की सामान्य विधि इस प्रकार है—
- सबसे पहले साफ मिट्टी या आटे का चौमुखी दीपक लें।
- इसमें सरसों का तेल या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार तेल डालें।
- दीपक के चारों मुखों में रुई की बातियां लगाएं।
- दीपक के नीचे थोड़े साबुत चावल यानी अक्षत रख सकते हैं।
- शाम को सूर्यास्त के बाद दीपक जलाएं।
- इसे घर के मुख्य द्वार के बाहर इस तरह रखें कि दीपक की लौ दक्षिण दिशा की ओर रहे।
- हाथ जोड़कर यमराज का स्मरण करें और परिवार की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुख-शांति की प्रार्थना करें।
दक्षिण दिशा में ही क्यों जलाया जाता है दीपक?
धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। इसी वजह से यम दीपदान के समय दीपक को दक्षिण दिशा की ओर रखने की परंपरा है। माना जाता है कि इस तरह दीपदान करने से यमराज की कृपा प्राप्त होती है।
यम दीपदान का क्या है महत्व?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर यमराज के निमित्त दीपदान करने से परिवार के सदस्यों की लंबी आयु और सुरक्षा की कामना की जाती है। यह परंपरा जीवन के प्रति सम्मान और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक भी मानी जाती है।
ध्यान रखें: यम दीपदान से अकाल मृत्यु निश्चित रूप से टलने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा अनुष्ठान है।





