रायगढ़ : भाजपा से अलग होने के बाद रवि भगत की बढ़ती सक्रियता, क्या बदल रहे हैं छत्तीसगढ़ के राजनीतिक समीकरण?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों पूर्व भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष रवि भगत का नाम लगातार चर्चा में है। भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने के बाद उन्होंने जिस तरह जनहित के मुद्दों को लेकर आंदोलन की राह पकड़ी है, उसने न केवल स्थानीय राजनीति बल्कि प्रदेश स्तर पर भी नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता, जनसभाओं में बढ़ती भीड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार संपर्क अभियान इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे अपनी राजनीतिक पहचान को नए स्वरूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
रवि भगत का भाजपा से अलगाव किसी एक घटना का परिणाम नहीं माना जा रहा। पिछले कुछ समय से वे लगातार अपने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं को सार्वजनिक रूप से उठाते रहे। लैलूंगा क्षेत्र में वर्षों से अधूरी पड़ी सड़कों, खनन प्रभावित गांवों में विकास कार्यों, डीएमएफ निधि के उपयोग तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर उन्होंने अपनी ही सरकार और संगठन के समक्ष सवाल खड़े किए। इन मुद्दों को लेकर संगठन और उनके बीच मतभेद लगातार गहराते गए, जिसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया।
गिरफ्तारी के बाद बढ़ी राजनीतिक चर्चा
साइकिल वितरण योजना में कथित रूप से निम्न गुणवत्ता की सामग्री का मुद्दा उठाने के दौरान हुई उनकी गिरफ्तारी ने पूरे घटनाक्रम को नया राजनीतिक आयाम दिया। समर्थकों का दावा है कि इस घटना के बाद रवि भगत के प्रति लोगों का समर्थन और बढ़ा। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने कहा कि वे केवल एक योजना तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में लागू सभी योजनाओं की गुणवत्ता की निगरानी करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर जनआंदोलन तथा कानूनी कार्रवाई दोनों का रास्ता अपनाएंगे।
विकास के मुद्दों को बनाया राजनीतिक एजेंडा
रवि भगत लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि क्षेत्र के विकास और जनता के अधिकारों के लिए है। उन्होंने विशेष रूप से लैलूंगा क्षेत्र की लगभग 25 वर्षों से लंबित सड़क परियोजना, खनन प्रभावित गांवों की समस्याएं, विस्थापन, श्मशान घाट, देवस्थलों के संरक्षण और बुनियादी सुविधाओं को अपने अभियान का प्रमुख विषय बनाया है।
उनका कहना है कि खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्रों को विकास का उचित लाभ मिलना चाहिए और डीएमएफ की राशि का उपयोग सीधे प्रभावित गांवों के हित में होना चाहिए।
संगठनात्मक फैसलों से बढ़ी नाराजगी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में संगठन द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों ने भी रवि भगत और उनके समर्थकों में असंतोष पैदा किया। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण से लेकर जिला पंचायत के नेतृत्व संबंधी फैसलों तक कई ऐसे निर्णय हुए जिन्हें लेकर समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए।
रवि भगत की पत्नी शांता भगत का नाम भी जिला पंचायत अध्यक्ष पद की संभावित दावेदारों में माना जा रहा था, लेकिन पार्टी ने किसी अन्य चेहरे पर भरोसा जताया। इसके बाद जिला पंचायत उपाध्यक्ष पद के चयन को लेकर भी संगठन के भीतर चर्चाएं तेज रहीं। इन घटनाओं ने यह संदेश दिया कि संगठन अब नए राजनीतिक समीकरणों के आधार पर फैसले ले रहा है।
भाजपा के लिए चुनौती या सीमित क्षेत्रीय प्रभाव?
रवि भगत आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे में उनका पार्टी से अलग होना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इसका व्यापक चुनावी असर कितना होगा, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता ने भाजपा के सामने चुनौती जरूर खड़ी की है।
दूसरी ओर भाजपा का मानना है कि संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है और पार्टी अपने संगठनात्मक ढांचे के आधार पर आगे बढ़ती रहेगी। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि रवि भगत का जनसंपर्क अभियान कितना व्यापक राजनीतिक समर्थन हासिल कर पाता है।
ओपी चौधरी को लेकर क्या बोले रवि?
जेल से रिहा होने के बाद रवि भगत ने मंत्री एवं रायगढ़ विधायक ओपी चौधरी को लेकर भी अपना पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उनकी किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। यदि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए डीएमएफ निधि का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो जाए तो वे उसका स्वागत करेंगे। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता केवल क्षेत्र का विकास और जनता के अधिकार हैं।
सड़क आंदोलन से नई राजनीतिक शुरुआत
भाजपा छोड़ने के बाद रवि भगत ने अपने पहले बड़े जनआंदोलन की घोषणा लैलूंगा के बहुप्रतीक्षित तोलगे मार्ग के निर्माण की मांग को लेकर की है। 1 अगस्त से शुरू होने वाले इस आंदोलन में धरना-प्रदर्शन और आवश्यकता पड़ने पर चक्का जाम की रणनीति भी बनाई गई है।
करीब ढाई दशक से अधूरी पड़ी इस सड़क को वे केवल आवागमन का विषय नहीं बल्कि आदिवासी अंचल के विकास और सम्मान का प्रश्न बता रहे हैं। राजनीतिक जानकारों की नजर अब इस आंदोलन पर टिकी है क्योंकि इसे रवि भगत की नई राजनीतिक पारी की पहली बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
आगे क्या?
रवि भगत भविष्य में चुनाव लड़ेंगे या नहीं, इस पर उन्होंने कोई अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया है। उनका कहना है कि परिस्थितियों और जनता की अपेक्षाओं के अनुसार आगे की रणनीति तय की जाएगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भाजपा से अलग होने के बाद रवि भगत प्रदेश की राजनीति में एक सक्रिय और चर्चित चेहरा बन चुके हैं। अब यह देखना होगा कि उनका आंदोलन स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहता है या प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ा प्रभाव छोड़ने में सफल होता है।


