
रायगढ़ : ‘विकास’ के नाम पर विनाश का डर, कैनाल रोड परियोजना पर उठ रहे गंभीर सवाल
रायगढ़ : शहर के ‘कैनाल लिंक रोड’ प्रोजेक्ट ने इन दिनों स्थानीय राजनीति और प्रशासन के गलियारों में हलचल मचा दी है। केवड़ाबाड़ी से मरीन ड्राइव तक बनने वाली इस सड़क के आड़े अब सैकड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का आशियाना आ गया है। 29 मई की डेडलाइन सिर पर है और वार्ड क्रमांक 11 (जोगीडीपा-इंदिरा नगर) के निवासी इस ‘अधूरी योजना’ के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं।

जब कागज़ का ‘नक्शा’ और ज़मीनी ‘सच्चाई’ टकराई
तकनीकी रूप से एक कैनाल रोड का मतलब होता है—नाले के समानांतर खाली ज़मीन का उपयोग करना। मास्टर प्लान में भी सड़क की चौड़ाई 12 मीटर तय थी। लेकिन, रातों-रात हुए इस बदलाव ने पूरी तस्वीर ही बदल दी। अब यह सड़क नाले के किनारे नहीं, बल्कि घनी आबादी के सीने पर से गुजर रही है। 12 मीटर से बढ़ाकर 18 मीटर की गई सड़क की चौड़ाई, स्थानीय लोगों के लिए किसी ‘मौत के फरमान’ से कम नहीं है।

बिल्डर लॉबी को ‘सीधा लाभ’ पहुँचाने का आरोप
पीड़ित रहवासियों के आक्रोश के पीछे का सबसे बड़ा कारण है—परियोजना का संदिग्ध मार्ग। लोगों का आरोप है कि इस मार्ग को घुमाकर एक ऐसे निजी भूखंड (लगभग 7 एकड़) के करीब ले जाया गया है, जो एक रसूखदार बिल्डर की है। सड़क के चौड़ीकरण से उस जमीन की व्यावसायिक वैल्यू कई गुना बढ़ जाएगी। सवाल यह है कि शहर के गरीब तबके की पीढ़ियों पुरानी बसाहट को उजाड़कर क्या किसी निजी कॉलोनाइजर की तिजोरी भरने की तैयारी है?

’35 का आंकड़ा’ बनाम धरातल की हकीकत
नगर निगम का दावा है कि इस परियोजना से सिर्फ 35 परिवार प्रभावित होंगे। लेकिन, धरातल पर सच्चाई कुछ और ही है। मरीन ड्राइव तक के प्रस्तावित सफर में धोबी मोहल्ला, बाबू पारा और वहीदार पारा जैसे इलाकों के कम से कम 60-70 घर इसकी चपेट में आने की पूरी आशंका है। निगम के पास इतने परिवारों के विस्थापन या मुआवजे की कोई पुख्ता कार्ययोजना नहीं है, जो प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
मानसून और ‘खुले आसमान’ का खतरा
सबसे डरावना पहलू समय का चयन है। मानसून की आहट के बीच, जून के पहले पखवाड़े में घरों को ढहाने की तैयारी चल रही है। अगर निगम इस जल्दबाजी में तोड़फोड़ करता है, तो उन परिवारों का क्या होगा जिनके पास सिर छुपाने के लिए एक भी कमरा नहीं बचेगा?

महज बातों का शोर, लिखित गारंटी से क्यों है प्रशासनिक परहेज?
जन-आक्रोश के दबाव में आकर महापौर जीवर्धन चौहान ने प्रभावितों को टीवी टावर में फ्लैट देने और नुकसान कम से कम करने का आश्वासन तो दिया, लेकिन जैसे ही जागरूक रहवासियों ने इस विस्थापन योजना की ‘लिखित गारंटी’ मांगी, प्रशासन के सुर बदल गए। महापौर ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि यह नीतिगत निर्णय उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, बल्कि कमिश्नर और आला अधिकारियों के स्तर का मामला है।
जिला कांग्रेस ने बनाई जांच टीम
अधिकारपूर्ण लिखित आश्वासन मिलने के बजाय प्रशासन की इस ‘टालमटोल’ वाली नीति ने लोगों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया है। बिना किसी वैधानिक सुरक्षा के 29 मई की बेदखली डेडलाइन अब शहर में एक बड़े जन-आंदोलन की बारूद तैयार कर रही है। इस मामले में जिला कांग्रेस ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए एक जांच कमेटी का गठन कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट है कि विस्थापन के इस मुद्दे पर राजनीतिक संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर आ पहुँचा है।
प्रशासन से बुनियादी सवाल :
- मास्टर प्लान में दर्ज 12 मीटर की सड़क को 18 मीटर करने के पीछे का ‘तकनीकी आधार’ क्या है?
- यदि यह कैनाल रोड है, तो इसे नाले के बफर जोन में क्यों नहीं बनाया जा रहा?
- मानसून के ठीक पहले बिना पुनर्वास की गारंटी के परिवारों को सड़क पर लाना क्या प्रशासनिक न्याय है?
फिलहाल, जोगीडीपा के लोग अब प्रशासन से एक ही सवाल कर रहे हैं –
“क्या विकास की कीमत सिर्फ गरीब की ज़मीन और उसका घर ही है?”


