लैलूंगा का जवांफूल चावल बना नई पहचान
मुख्यमंत्री निवास तक पहुंच रही खुशबू, 175 से 180 रुपये किलो बिक रहा सुगंधित चावल
रायगढ़, 21 जुलाई। लैलूंगा विकासखंड का पाकरगांव अपनी पारंपरिक सुगंधित जवांफूल धान की खेती के लिए नई पहचान बना रहा है। यहां के किसान वर्षों पुरानी धान प्रजाति का संरक्षण करते हुए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन कर रहे हैं। बेहतर गुणवत्ता और बढ़ती मांग के कारण पाकरगांव का जवांफूल चावल अब मुख्यमंत्री निवास तक भी पहुंच रहा है।
10 एकड़ में सामूहिक खेती कर रहे किसान
ग्राम पाकर के किसान निर्भय राम नायक, सेवक राम नायक, बूंद राम नायक, प्रदीप नायक और गणेश राम नायक सामूहिक रूप से लगभग 10 एकड़ में जवांफूल धान की खेती कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि यह पारंपरिक धान प्रजाति स्वाद, सुगंध और गुणवत्ता के कारण सामान्य धान की तुलना में अधिक लाभदायक साबित हो रही है।
रायपुर से दिल्ली तक बढ़ी मांग
किसानों के अनुसार, पाकरगांव का जवांफूल चावल रायपुर, दिल्ली सहित कई बड़े शहरों तक पहुंच रहा है। वर्तमान में यह चावल 175 से 180 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। बेहतर गुणवत्ता के कारण उपभोक्ता सीधे किसानों से भी चावल खरीदने पहुंच रहे हैं।
प्रति एकड़ 12 से 15 क्विंटल उत्पादन
किसानों ने बताया कि जवांफूल धान की खेती में विशेष देखभाल, शुद्ध बीज और समय पर कृषि कार्य आवश्यक होता है। इस धान से प्रति एकड़ लगभग 12 से 15 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता है तथा मिलिंग के बाद करीब 60 प्रतिशत चावल निकलता है। लैलूंगा क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी इस फसल के लिए अनुकूल मानी जाती है।
हरी खाद से बढ़ा रहे मिट्टी की उर्वरता
इस खरीफ सीजन में किसान खेतों में ढैंचा का उपयोग हरी खाद के रूप में कर रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ने के साथ फसल को प्राकृतिक पोषण मिल रहा है। किसानों को ढैंचा का बीज कृषि विभाग और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से उपलब्ध कराया गया है।
कृषि विभाग दे रहा तकनीकी मार्गदर्शन
कृषि विभाग द्वारा किसानों को उन्नत कृषि तकनीक, स्थानीय धान प्रजातियों के संरक्षण और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए लगातार मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन दिया जा रहा है। पाकरगांव के किसानों की यह पहल पारंपरिक खेती, प्राकृतिक कृषि और किसानों की बढ़ती समृद्धि का सफल उदाहरण बनकर उभर रही है।



