लैलूंगा का जवाफूल बन रहा किसानों की समृद्धि का जरिया

बढ़ती मांग के बीच दूसरे क्षेत्रों के किसान खरीद रहे बीज और चावल, सुगंधित धान की बढ़ रही पहचान

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रायगढ़। कभी केवल स्थानीय स्तर पर पहचाना जाने वाला लैलूंगा क्षेत्र का पारंपरिक जवाफूल धान अब किसानों की समृद्धि का नया माध्यम बनता जा रहा है। अपनी विशेष सुगंध, स्वाद और गुणवत्ता के कारण यह धान प्रदेश ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों तक पहचान बना रहा है। बढ़ती मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे क्षेत्रों के किसान स्वयं लैलूंगा पहुंचकर जवाफूल धान का बीज और चावल खरीद रहे हैं।


खुशबू और स्वाद ने बनाया लोगों को दीवाना

हाल ही में खरसिया क्षेत्र से पहुंचे किसानों और ग्रामीणों ने जवाफूल चावल की गुणवत्ता और इसकी अनूठी सुगंध की सराहना की। उन्होंने बताया कि चावल की विशेष खुशबू ने उन्हें दोबारा लैलूंगा आने के लिए प्रेरित किया। किसानों ने यहां से चावल के साथ-साथ बीज भी खरीदा, ताकि अपने क्षेत्र में इसकी खेती कर बेहतर लाभ प्राप्त कर सकें।


उत्पादन कम, मांग ज्यादा

लैलूंगा के किसान चंद्रशेखर पटेल ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष चार एकड़ में जवाफूल धान की खेती की थी, जिससे लगभग 40 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि वर्तमान में जवाफूल धान और चावल की मांग इतनी अधिक है कि उपलब्ध उत्पादन से सभी उपभोक्ताओं की जरूरत पूरी कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने बताया कि उनके खेतों में उत्पादित जवाफूल धान और चावल रायगढ़, रायपुर, अंबिकापुर, रामानुजगंज समेत ओडिशा और मध्यप्रदेश के कई क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। कई ग्राहक तो अग्रिम भुगतान कर चावल की बुकिंग भी करा रहे हैं।


सुगंध और स्थानीय जलवायु है सबसे बड़ी ताकत

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जवाफूल धान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है। लैलूंगा की जलवायु और मिट्टी इस फसल के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है, जिससे इसकी गुणवत्ता और भी बेहतर हो जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि यह पारंपरिक धान अब बाजार में अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सफल हो रहा है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन रहा है।


खेती का रकबा बढ़ाने की तैयारी

कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि लैलूंगा विकासखंड का चयन जैविक सुगंधित धान फसल ‘जवाफूल’ की खेती के लिए किया गया है। बढ़ती मांग को देखते हुए प्रशासन किसानों को इसके रकबे में विस्तार के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पिछले वर्ष 315 हेक्टेयर क्षेत्र में जवाफूल की खेती की गई थी, जिससे 521 किसानों को लाभ मिला। वहीं इस वर्ष इसका रकबा बढ़ाकर 750 हेक्टेयर करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।


किसानों के लिए बन रहा लाभ का सौदा

जवाफूल धान की बढ़ती लोकप्रियता और बेहतर बाजार मूल्य किसानों के लिए नई संभावनाएं लेकर आई है। कृषि विभाग का मानना है कि यदि इसी तरह मांग बढ़ती रही तो आने वाले वर्षों में लैलूंगा का जवाफूल प्रदेश के प्रमुख सुगंधित धान ब्रांडों में शामिल हो सकता है और क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति को और अधिक मजबूत बना सकता है।

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