कलेक्टर के मौखिक आदेश की आड़ में ₹15 हजार की कथित वसूली का आरोप!
बिलासपुर से तखतपुर तक मूल खसरे से टुकड़ों में रजिस्ट्री के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगने की चर्चा, जिला पंजीयक ने जांच का दिया भरोसा
अनिल शुक्ला की रिपोर्ट
बिलासपुर। डायवर्सन भूमि के मूल खसरे से छोटे-छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री कराने के नाम पर 15 हजार रुपये तक की कथित अतिरिक्त रकम मांगे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि बिलासपुर कलेक्टर के मौखिक आदेश का हवाला देकर रजिस्ट्री में अड़चन बताई जाती है, जबकि अतिरिक्त रकम देने पर काम कराने की बात कही जाती है। बिलासपुर से तखतपुर तक पंजीयन व्यवस्था से जुड़े इन आरोपों ने पारदर्शिता और निर्धारित प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौखिक आदेश की आड़ में रजिस्ट्री पर रोक? लिखित निर्देश कहां है?
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि मूल खसरे से छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री को लेकर वास्तव में कौन-सा प्रशासनिक निर्देश लागू है। यदि कोई आदेश प्रभावी है, तो उसकी लिखित प्रति, कानूनी आधार और लागू प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। केवल मौखिक आदेश का हवाला देकर आवेदकों को रोका जा रहा है या नहीं, इसकी जांच भी जरूरी है।
मीडिया की पड़ताल में ₹15 हजार तक अतिरिक्त रकम मांगने का दावा
मीडिया की पड़ताल के दौरान जिला पंजीयन कार्यालय में मौजूद कुछ दस्तावेज लेखकों ने कथित तौर पर बताया कि डायवर्सन भूमि के मूल खसरे से किसी हिस्से की रजिस्ट्री कराने के लिए 15 हजार रुपये तक अतिरिक्त देने पड़ सकते हैं। उनके कथन के अनुसार, यह रकम कार्यालय के भीतर संबंधित अधिकारियों तक पहुंचती है।
हालांकि, कथित रकम की मांग किसने की, भुगतान वास्तव में हुआ या नहीं और रकम का अंतिम प्राप्तकर्ता कौन है—इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। फिलहाल किसी अधिकारी की संलिप्तता को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। आरोपों की सच्चाई संबंधित रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी।
तखतपुर में बैठक के आश्वासन के बाद फोन पर स्पष्ट जवाब नहीं
मामले में तखतपुर उप पंजीयक आशीष तिवारी की भूमिका और कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पूर्व में चर्चा के दौरान तिवारी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी भी प्रकार के अघोषित लेन-देन का उन्हें कोई समर्थन नहीं है। उन्होंने इस विषय पर दस्तावेज लेखकों और पंजीयन कार्य से जुड़े लोगों की बैठक लेकर स्पष्ट निर्देश जारी करने की बात कही थी।
इसी क्रम में सोमवार को प्रस्तावित बैठक के संबंध में जब उनसे फोन पर जानकारी मांगी गई, तो बैठक की स्थिति और आगे की कार्रवाई को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। उन्होंने फोन पर जानकारी देने के बजाय कार्यालय आने की बात कही।
ऐसे में सवाल उठता है कि अघोषित लेन-देन पर रोक लगाने के लिए प्रस्तावित बैठक हुई या नहीं? यदि बैठक हुई, तो उसमें क्या निर्देश दिए गए? और यदि बैठक नहीं हुई, तो इसके पीछे क्या कारण रहा? इन सवालों पर उप पंजीयक कार्यालय की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने आना बाकी है।
बिलासपुर से तखतपुर तक एक जैसी रकम की चर्चा, जांच की जरूरत
बिलासपुर से तखतपुर तक कथित अतिरिक्त रकम की चर्चा यह सवाल खड़ा करती है कि क्या अलग-अलग कार्यालयों में ऐसी मांगें की जा रही हैं या किसी एक जैसी प्रक्रिया के नाम पर आवेदकों से रकम मांगी जा रही है। हालांकि, किसी संगठित नेटवर्क या रकम के बंटवारे की अभी पुष्टि नहीं हुई है।
इन तथ्यों की जांच के लिए संबंधित कार्यालयों के रिकॉर्ड, शिकायतों, निर्धारित शुल्क और रजिस्ट्री से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक है। प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि मूल खसरे से छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री किन नियमों और शर्तों के तहत की जा सकती है।
जिला पंजीयक आर.के. स्वर्णकार ने कार्रवाई का दिया भरोसा
मामले में जिला पंजीयक आर.के. स्वर्णकार से चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि इस तरह का कृत्य कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वसूली या अन्य अनियमित गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने जांच कर दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा भी दिया।
वहीं, सूत्रों से एक उप पंजीयक को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की संभावना की जानकारी मिली है। हालांकि, नोटिस जारी होने और उसमें दर्ज आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
अब जांच और स्पष्ट निर्देशों का इंतजार
इस पूरे मामले में प्रशासन के सामने तीन प्रमुख सवाल हैं—मूल खसरे से छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री को लेकर लागू नियम क्या हैं, निर्धारित शुल्क के अतिरिक्त रकम मांगने के आरोपों में कितनी सच्चाई है और तखतपुर में अघोषित लेन-देन रोकने के लिए प्रस्तावित बैठक में क्या निर्णय लिया गया?
जिला पंजीयक के कार्रवाई के आश्वासन के बाद अब संबंधित आदेशों की स्थिति स्पष्ट करने, निर्धारित शुल्क सार्वजनिक करने और शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने की जरूरत है। आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि जमीन की रजिस्ट्री कराने वाले नागरिकों को किसी भी प्रकार के कथित अवैध सुविधा शुल्क के दबाव का सामना न करना पड़े।
