कलेक्ट्रेट की मल्टी लेवल पार्किंग बेकार, सड़कों पर रसूखदारों का कब्जा

कलेक्ट्रेट से नेहरू चौक तक नो-पार्किंग में खड़े रहते हैं वाहन, एसपी-आईजी कार्यालय के सामने भी ट्रैफिक नियम बेअसर

बिलासपुर। जिला मुख्यालय के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र में ट्रैफिक व्यवस्था की स्थिति इन दिनों गंभीर सवाल खड़े कर रही है। कलेक्ट्रेट परिसर से नेहरू चौक तक सड़क के दोनों ओर वाहनों की बेतरतीब पार्किंग आम हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इसी मार्ग पर जिला पुलिस अधीक्षक एवं पुलिस महानिरीक्षक का कार्यालय भी स्थित है, लेकिन प्रतिदिन सामने दिखाई देने वाली इस अव्यवस्था पर प्रभावी कार्रवाई होती नजर नहीं आती।

कलेक्ट्रेट, तहसील कार्यालय, अनुविभागीय कार्यालय, नगर निगम विकास भवन, जिला पंचायत, कंपोजिट बिल्डिंग, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, पीडब्ल्यूडी कार्यालय, जिला पंजीयक कार्यालय सहित दर्जनों महत्वपूर्ण कार्यालय इसी क्षेत्र में संचालित हैं। इसके अलावा इसी मार्ग पर जिला न्यायालय भी मौजूद है। सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक इस पूरे इलाके में आम नागरिकों, अधिवक्ताओं, अधिकारियों और कर्मचारियों की भारी आवाजाही रहती है।

मल्टी लेवल पार्किंग बनी, लेकिन सड़कें ही बन गईं पार्किंग

लाखों रुपये खर्च कर तैयार की गई मल्टी लेवल पार्किंग का उद्देश्य ही यही था कि कलेक्ट्रेट और आसपास आने वाले लोगों के वाहनों को व्यवस्थित स्थान मिल सके। इसके बावजूद कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार के सामने, सड़क के दोनों ओर तथा जिला पंजीयक कार्यालय के प्रवेश द्वार के आसपास वाहन खड़े रहते हैं।

जगह-जगह ‘नो पार्किंग’ की पट्टिकाएं लगी हुई हैं, लेकिन इन पट्टिकाओं का वाहन चालकों पर कोई असर दिखाई नहीं देता। सवाल यह है कि यदि पार्किंग के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है तो फिर सरकारी कार्यालयों के मुख्य प्रवेश द्वार और सड़क किनारे वाहनों को खड़ा करने की छूट आखिर किसके संरक्षण में है?

एसपी-आईजी कार्यालय के सामने भी नहीं सुधरी व्यवस्था

सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस मार्ग पर आम नागरिकों से यातायात नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालय स्थित हैं, उसी मार्ग पर खुलेआम ट्रैफिक नियमों की अनदेखी होती दिखाई देती है।

यदि एसपी और आईजी कार्यालय के सामने से प्रतिदिन अधिकारी स्वयं गुजरते हैं और सड़क किनारे वाहनों की अव्यवस्थित पार्किंग देखते हैं, तो फिर इस व्यवस्था को सुधारने के लिए कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? यह सवाल अब आम नागरिकों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है।

जिला न्यायालय से वीआईपी आवास तक, फिर भी व्यवस्था लचर

इसी मार्ग पर जिला न्यायालय होने के कारण प्रतिदिन बड़ी संख्या में अधिवक्ता, पक्षकार और न्यायिक अधिकारी भी आवागमन करते हैं। आगे नेहरू चौक क्षेत्र में केंद्रीय राज्य मंत्री का निवास तथा कई वरिष्ठ अधिकारियों और न्यायाधीशों के आवास भी मौजूद हैं।

कार्यालयीन समय में सड़क के दोनों ओर बड़ी संख्या में कारें खड़ी दिखाई देती हैं। इनमें आम नागरिकों के साथ-साथ रसूखदार लोगों के वाहन भी शामिल बताए जाते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या ट्रैफिक नियम सभी के लिए समान हैं या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए नियमों की अलग व्यवस्था है?

नो-पार्किंग बोर्ड लगाकर जिम्मेदारी पूरी समझ रहा विभाग?

यदि नो-पार्किंग क्षेत्र में लगातार वाहन खड़े होते हैं और यातायात बाधित होता है तो केवल बोर्ड लगा देना पर्याप्त नहीं है। नियम तोड़ने वाले वाहनों पर नियमित कार्रवाई, टोइंग व्यवस्था और पार्किंग क्षेत्र में वाहनों को स्थानांतरित कराने जैसी व्यवस्था भी जरूरी है।

कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यदि किसी आपात स्थिति में एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड या पुलिस वाहन को तत्काल रास्ते की जरूरत पड़े और सड़क के दोनों ओर वाहन खड़े मिलें तो स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

बड़ा सवाल—कार्रवाई कब होगी?

मल्टी लेवल पार्किंग मौजूद है, नो-पार्किंग के बोर्ड लगे हैं, एसपी-आईजी कार्यालय इसी मार्ग पर हैं, जिला न्यायालय मौजूद है और आसपास वीआईपी तथा वरिष्ठ अधिकारियों के आवास हैं। इसके बावजूद यदि सड़क पर अव्यवस्थित पार्किंग जारी है तो जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

क्या जिला प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रही है? क्या प्रभावशाली लोगों के वाहनों पर भी वही कार्रवाई होगी जो आम नागरिकों के वाहनों पर की जाती है?

अब जरूरत केवल नई पार्किंग व्यवस्था बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा मल्टी लेवल पार्किंग को प्रभावी रूप से संचालित कराने और नो-पार्किंग जोन में खड़े वाहनों पर बिना किसी भेदभाव के सख्त कार्रवाई करने की है।

वरना ‘नो पार्किंग’ के बोर्ड सड़क किनारे लगे रहेंगे और सड़कें ही पार्किंग स्थल बनी रहेंगी।

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