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कांग्रेस अध्यक्ष बोले— बंदूक की नोक पर जंगल काटकर आदिवासियों को उजाड़ रही है कॉरपोरेट सरकार
● अडानी-भाजपा के रिश्तों पर उठाया सवाल — “ये रिश्ता क्या कहलाता है?”
● एनजीटी ने जिस परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी रद्द की, उसकी फर्जी ग्रामसभा दिखाकर हो रही कटाई: शुक्ला
रायगढ़, 29 जून 2025 —
जिला कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शुक्ला ने मुड़ागांव क्षेत्र में चल रही कोयला खनन परियोजना को लेकर सांसद राधेश्याम राठिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि जब भी कांग्रेस अडानी समूह को लेकर आंदोलन करती है, भाजपा बचाव में उतर आती है। उन्होंने सांसद राठिया से पूछा कि वह अडानी के हिमायती बनने की बजाय क्यों नहीं आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में सामने आते?
अनिल शुक्ला ने कहा कि तमनार-लैलूंगा क्षेत्र के मुड़ागांव में गारे पेलमा सेक्टर-2 कोल ब्लॉक के लिए चल रही वन कटाई पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के विपरीत है। इस परियोजना को महाजेनको को आवंटित किया गया है, जिसने एमडीओ के रूप में अडानी इंटरप्राइजेज से अनुबंध किया है।
उन्होंने दावा किया कि—
“ग्रामसभा की स्वीकृति फर्जी है, एनजीटी ने पर्यावरण मंजूरी रद्द की थी और पब्लिक हियरिंग के दौरान ग्रामीणों ने साफ विरोध जताया था, इसके बावजूद आज हजारों की संख्या में पुलिस भेजकर जंगल काटे जा रहे हैं।”
अनिल शुक्ला ने यह भी बताया कि 2583 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर फैले इस कोल ब्लॉक से 14 गांवों के 2245 परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें अधिकांश आदिवासी हैं।
उन्होंने पूर्व विधायक सत्यानंद राठिया की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि—
“जब सांसद चुप हैं, तब सत्यानंद राठिया ने विरोध दर्ज कराकर गिरफ्तारी दी और संवेदनशीलता दिखाई।”
“जनता के अधिकारों के बदले बिछा रेड कारपेट”
शुक्ला ने तंज कसते हुए कहा कि—
“सांसद राधेश्याम राठिया ने जिस भूमि पर आदिवासी पीढ़ियों से नंगे पांव चलते रहे हैं, वहां अब अडानी के स्वागत में रेड कारपेट बिछाने की भूमिका निभा रहे हैं।”
उन्होंने चेतावनी दी कि बिना ग्रामसभा, पर्यावरणीय स्वीकृति और वैधानिक प्रक्रिया के यदि किसी भी परियोजना को बंदूक की नोक पर लागू किया जाएगा तो कांग्रेस जन आंदोलन के माध्यम से उसका विरोध करेगी।
अंत में शुक्ला का सवाल — “जनहित की बात है तो गोमती साय से क्यों नहीं पूछे सवाल?”
पूर्ववर्ती सरकार की आड़ में वर्तमान मुद्दों से भागने के भाजपा नेताओं के प्रयास को उन्होंने “कारपोरेट गठजोड़ की ढाल” बताया।
“अगर सांसद को जनहित से इतनी ही चिंता है तो पूर्ववर्ती सांसद गोमती साय से क्यों नहीं पूछे सवाल? या फिर ये केवल जनता को गुमराह करने का नाटक है?”
यह खबर आदिवासी अधिकार, पर्यावरणीय न्याय और कॉरपोरेट-सरकार गठजोड़ के विरोध पर केंद्रित एक तीखा राजनीतिक विमर्श बनती है, जिसका असर आने वाले समय में राजनीतिक परिदृश्य पर देखने को मिल सकता है।
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