कैदियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए सात दिवसीय राजयोग मेडिटेशन की शुरुआत

बेमेतरा =प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय बेमेतरा द्वारा जिला जेल में बंदियों के लिए सात दिवसीय राजयोग मेडिटेशन शिविर का आयोजन किया जा रहा है,शिविर में ब्रह्माकुमारी शशि बहन  नेत्र चिकित्सक डॉ. ओंकार चंद्राकर , तहसील अधिकारी  किशन मानिकपुरी , सहित जेल के स्टाफ उपस्थित रहे।
बी. के. शशि बहन ने प्रथम दिवस सभी को स्वयं की पहचान, आत्मा का ज्ञान, मन में विचारों के 4 प्रकार, बुद्धि के कार्य, संस्कारों का प्रभाव तथा राजयोग अभ्यास से फायदे की जानकारी दी गई।। उन्हाेंने कहा कि आप सभी श्रेष्ठ आत्माएं हो, जिनको श्रेष्ठ कर्म करने के लिए परमात्मा ने इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर भेजा है। व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है।
सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए संस्कारों को श्रेष्ठ बनाने की विधियां बताई गई जिसको अपना कर हम अपने जीवन में सहज ही संस्कार परिवर्तन कर सकते हैं क्योंकि संस्कार परिवर्तन से ही संसार परिवर्तन होगा कहा भी जाता है संकल्प से सृष्टि रची जाती है जैसा सोच वैसा जीवन तो हम पॉजिटिव सोचकर अर्थात मन पर अटेंशन देकर अपने श्रेष्ठ संस्कार बना सकते हैं क्योंकि जो कुछ भी मेरे साथ अच्छा या बुरा हो रहा है इसका दोषी कोई और नहीं वह मैं स्वयं हूं तो स्वयं को खुश एवं संतुष्ट रख श्रेष्ठ कर्म करने की जिम्मेवारी हम स्वयं लें कहा भी जाता है स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन आज यदि हर व्यक्ति अपने मन को सही दिशा प्रदान करें तो उसके बोल और कर्म निश्चित ही श्रेष्ठ होंगे इसलिए कहा जाता है जैसा बीज वैसा फल।
आत्मा शाश्वत, चेतना,आध्यात्मिक प्रकाश, मैं व मौलिक वास्तविकता है।  इसलिए ‘मैं’ शब्द आत्मा के लिए है, शरीर के लिए नहीं। शारीरिक उपस्थिति से परे, आत्मा प्रकाश का एक छोटा सा बिंदु है। यह प्रकाश आत्मा के गुण वा शक्तियो का एक प्रतीक है। आत्मा मन और बुद्धि के संकाय के माध्यम से सोच सकती है और निर्णय ले सकती है। हम इस भौतिक शरीर के माध्यम से जीवन जीते हैं और हमारे साथ होने वाली हर चीज हमारे कर्म (पिछले कार्यों / कर्मों) का परिणाम है।
मानव जीवन अमूल्य है। हम अपने भविष्य को अपने फैसलों और कर्मों द्वारा आकार दे सकते हैं। हमारे पास सही और गलत मे अंतर करने के लिए बुद्धि है। सबसे प्यारे भगवान कहते है, ”स्वयं को आत्मा पहचानो।” इसके बिना, सबकुछ बेकार है और आत्म-प्राप्ति के साथ, सबकुछ प्राप्त हो गया है।

*देह अभिमान – दुख का मूल कारण*
हम एक चैतन्य आत्मा है। जब हम अपने असली स्वरूप को भूल, अपने को शरीर देखते वा समझते है, तो इसे ही देह अभिमान कहा जाता है।  वास्तव मे, यह देह का भान ही सभी विकार और दुख का कारण है। देह के भान वाली आत्मा अपने को निर्बल महसूस करेगी, क्योंकि देह की शक्ति सीमित होती है, जैसे देह स्वयं भी सीमित है। तो अब परमात्मा कहते है – ‘अपने को आत्मा-अभिमानी बनाओ, यह पुरुषार्थ करो। एक दूसरे को आत्मा देखो।’

आत्माभिमान (आत्मा की पहचान)- आनंदमय जीवन की अखूट कुंजी
आत्म जागृति अर्थात स्वयं की वास्तविकता को जानना l जेब हम आत्मा अभिमानी स्थिति मे थे, तो हम इस दुनिया के मालिक थे। आत्मा प्रकृति की मालिक अर्थात इस देह (शरीर) की मालिक थी।  जैसे एक रथी रथ का मालिक होता है। सभी मे दिव्य गुण रहते थे, क्योंकि शांति, आनंद, प्रेम और पवित्रता – यह आत्मा के निजी संस्कार है जो हमे परमपिता परमात्मा से मिले है।
तो जब हम आत्मा अभिमानी बने, तो सहज ही यह सभी गुण हम मे आ जाते है – जिससे हमारा जीवन मूल्यवान बनता है।  जो कहा जाता है – मनुष्य जीवन अति मूल्यवान जीवन है – यह अभी के समय के लिए गायन है l
उक्त विचार ब्रह्माकुमारीज़ बेमेतरा द्वारा जिला जेल परिसर में बंदी भाईयों के जीवन उत्थान के लिए आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय ब्रह्माकुमारिज़ की सेवाकेंद्र प्रभारी बी.के. शशि बहन ने व्यक्त किया। इस अवसर पर लगभग 100 बंदियों सहित जिला जेल स्टाफ सम्मिलित हुए, सभी ने मेडिटेशन कर बहुत-बहुत आत्मिक शांति एवं खुशी का अनुभव किया और आगे यह राजयोग शिविर प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे से 10:00 बजे तक चलेगा जिसका लाभ सभी कैदी भाई ले सकेंगे एवं अपने जीवन को एक श्रेष्ठ दिशा की ओर मोड़ सकेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button