छत्तीसगढ़ में हरतालिका तीज की शुरुआत कड़वाहट से क्यों होती है? जानिए ‘करू-भात’ का रहस्य

*विशेष रिपोर्ट: तीज पर्व पर*

छत्तीसगढ़ में तीज सिर्फ व्रत नहीं, संस्कार है। हरतालिका तीज के 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत से एक दिन पहले यहां घर-घर में ‘करू-भात’ खाने की परंपरा निभाई जाती है। तीजा के एक दिन पहले महिलाएं जानबूझ कर कड़वा भोजन करती हैं – जिसे करू-भात कहा जाता है।

*क्या होता है करू-भात में?
इस दिन की थाली में सामान्य भात के साथ कड़वी जिमीकंद (सूरन), फुटू-कांदा, करेला की सब्जी, नोनी भाजी, मुनगा भाजी और नीम की कोमल कोंपलें परोसी जाती हैं। कई जगह इसे सरगी की तरह सूर्योदय से पहले खाया जाता है।

हमारे बुजुर्गों ने इस परंपरा के पीछे तीन बड़े कारण बताए हैं, जो आज का विज्ञान भी सच मानता है:

1. देह शुद्धि – शरीर का Natural Detox
हरतालिका तीज साल का सबसे कठिन व्रत है। बिना अन्न-जल के रहने से पहले शरीर को तैयार करना जरूरी है। करेला, जिमीकंद और कड़वी भाजियों का कड़वा रस लिवर को सक्रिय करता है, पित्त और कफ को संतुलित करता है। इससे व्रत के दौरान गैस, एसिडिटी, उल्टी और अत्यधिक प्यास नहीं लगती। यह एक तरह से शरीर की आंतरिक सफाई है।

2. इंद्रिय संयम – तप की पहली परीक्षा
धर्मशास्त्र में कहा गया है – ‘कड़वा रस वैराग्य का प्रतीक है’। मीठा स्वाद लोभ जगाता है, कड़वा लोभ को मारता है। व्रत से पहले कड़वा खाकर महिलाएं अपनी जिह्वा पर नियंत्रण का संकल्प लेती हैं। यह संदेश है कि अब मन स्वाद में नहीं, शिव-पार्वती की भक्ति में लगेगा। माता पार्वती ने भी शिव को पाने के लिए कड़वी पत्तियां खाकर तप किया था।

3. ऋतु रक्षा – भादो में बीमारियों से कवच
हरतालिका तीज भाद्रपद यानी बरसात के मौसम में आती है, जब पेट के रोग सबसे ज्यादा होते हैं। कड़वी चीजों में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और इम्युनिटी बढ़ाने वाले गुण होते हैं। यह परंपरा मौसम जनित बीमारियों से बचाव का हमारे पूर्वजों का आयुर्वेदिक उपाय है।

करू-भात केवल भोजन नहीं है, यह छत्तीसगढ़ की लोक-चिकित्सा, आध्यात्म और संस्कृति का संगम है। कड़वाहट से मिठास की ओर जाने का यह रास्ता ही तो भारतीय संस्कृति की सुंदरता है।

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