छाल खदान विस्तार पर विरोध के दावों की अग्निपरीक्षा : जनसुनवाई नजदीक, सीमित नजर आ रही जनप्रतिनिधियों और संगठनों की भूमिका
कुड़ेकेला:- दक्षिण पूर्वी कोयला क्षेत्र लिमिटेड (SECL) की छाल खदान विस्तार परियोजना को लेकर क्षेत्र में असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई में अब महज 12 दिन शेष हैं, जिसके चलते प्रभावित गांवों के ग्रामीण अपनी जमीन, पर्यावरण और अधिकारों की सुरक्षा के लिए लामबंद होने की तैयारी में जुट गए हैं। हालांकि, ग्रामीणों के बीच इस बात की चर्चा भी तेज है कि जिस खदान विस्तार को लेकर व्यापक जनचर्चा होनी चाहिए थी, उसके विरोध में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, कथित समाजसेवियों और पर्यावरण संरक्षण का दावा करने वाले लोगों की सक्रियता अभी तक अपेक्षित स्तर पर नजर नहीं आ रही है।
जनसुनवाई करीब, क्यों कमजोर पड़ रही विरोध की आवाज?
ग्रामीणों का साफ तौर पर कहना है कि खदान का यह विस्तार केवल कोयला उत्पादन क्षमता बढ़ाने भर का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उनकी उपजाऊ जमीन, जलस्रोतों, खेती, जंगलों, वन्यजीवों और स्थानीय आबादी के भविष्य से जुड़ा हुआ है। जनसुनवाई की तारीख नजदीक होने के बावजूद यदि विरोध केवल बैठकों, बयानों और सांकेतिक गतिविधियों तक ही सीमित रहता है, तो प्रभावित लोगों की वास्तविक और गंभीर चिंताएं सक्षम मंच पर कैसे प्रभावी ढंग से सामने आ पाएंगी, यह एक बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि पुरुंगा कोल ब्लॉक के मुद्दे पर मुखर होकर सक्रिय रहने वाले कुछ लोग छाल खदान विस्तार के मामले में वैसी तत्परता और सक्रियता क्यों नहीं दिखा रहे हैं, जैसी एक बड़े खनन प्रकल्प के संभावित पर्यावरणीय व सामाजिक दुष्प्रभावों को देखते हुए अपेक्षित है। अब जरूरत इस बात की है कि ऐसे लोग स्वयं आगे आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करें।
क्या छाल में भी देखने को मिलेगा पुरुँगा जैसा विरोध?
छाल क्षेत्र के रहवासियों के लिए खनन गतिविधियों का यह विस्तार केवल औद्योगिक विकास का मामला नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक, क्षेत्र में पहले से ही पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, विस्थापन और पुनर्वास से जुड़ी पुरानी समस्याओं का समाधान होना अभी बाकी है। ऐसे में खदान विस्तार की प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि पर्यावरणीय प्रभावों का निष्पक्ष आकलन हो और प्रभावितों की आपत्तियों को महज एक कागजी औपचारिकता मानकर न टाला जाए। छाल खदान के पूर्व के पर्यावरणीय रिकॉर्ड्स में भी खनन क्षमता और पट्टा क्षेत्र बढ़ाने का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि भूमि, जल और सामाजिक परिवेश पर इसके गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।
विधायक और जनप्रतिनिधियों से ग्रामीणों को बड़ी उम्मीदें
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि कुछ जनप्रतिनिधियों ने विरोध का मौखिक समर्थन तो जरूर जताया है, लेकिन धरातल पर अब तक कोई व्यापक, ठोस और निरंतर पहल दिखाई नहीं दी है। उनका कहना है कि यदि वास्तव में उन्हें ग्रामीणों के जीवन, जंगल और आजीविका की चिंता है, तो जनसुनवाई से पहले प्रभावित गांवों में खुली बैठकें होनी चाहिए, पर्यावरणीय रिपोर्ट और दस्तावेजों का स्थानीय भाषा में विश्लेषण किया जाना चाहिए तथा प्रशासन के समक्ष लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की ठोस पहल होनी चाहिए।
इसके साथ ही, खुद को पर्यावरण प्रेमी और समाजसेवी बताने वाले लोगों से भी ग्रामीण यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित न रहें, बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा, जलस्रोतों के संरक्षण और विस्थापन से जुड़े मुद्दों पर तथ्य आधारित अभियान चलाएं। पर्यावरणीय जनसुनवाई प्रभावितों को अपनी बात रखने का आधिकारिक मंच देती है, इसलिए बहिष्कार की रणनीति अपनाने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आपत्तियां रिकॉर्ड पर आएं।
विकास के साथ जवाबदेही तय करना क्यों जरूरी?
छाल खदान विस्तार को लेकर अब बहस केवल विरोध या समर्थन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मुख्य सवाल यह है कि खनन विस्तार से प्रभावित होने वाले आम नागरिकों के अधिकारों, पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रशासन और प्रबंधन ने क्या पुख्ता इंतजाम किए हैं। जनसुनवाई में अब बमुश्किल 12 दिन ही बचे हैं, ऐसे में छाल के ग्रामीणों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या विरोध के स्वर केवल बयानों तक सीमित रहेंगे या फिर जल, जंगल और जनजीवन को बचाने के लिए कोई ठोस, संगठित और तथ्य-आधारित पहल सामने आएगी।











