जीवनदीप समिति बिल्हा में नियमों की अनदेखी कर लाखों का वित्तीय लेनदेन!
BPM को बिना अधिकृत आदेश बनाया द्वितीय हस्ताक्षरी, तत्कालीन और वर्तमान BMO की भूमिका पर गंभीर सवाल; सरकारी धन के दुरुपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग
अनिल शुक्ला की रिपोर्ट
बिल्हा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) बिल्हा की जीवनदीप समिति में वित्तीय अधिकारों के कथित दुरुपयोग और नियमों को दरकिनार कर लाखों रुपये के लेनदेन का मामला सामने आया है। आरोप है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद समिति में ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर (BPM) अनिल गढ़ेवाल को बिना विधिवत अनुमोदन और अधिकृत संशोधन के द्वितीय हस्ताक्षरी बनाकर चेकों के माध्यम से वित्तीय कार्य संपादित कराए जाते रहे। इस पूरे मामले में तत्कालीन खंड चिकित्सा अधिकारियों से लेकर वर्तमान BMO तक की भूमिका सवालों के घेरे में है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि मिशन संचालक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन छत्तीसगढ़ ने अपने पत्र क्रमांक JDS/2010/2/A 15/JDS/1176, दिनांक 12 मार्च 2010 के माध्यम से स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में संचालित जीवनदीप समिति में BPM को द्वितीय हस्ताक्षरी बनाए जाने तथा कार्यकारिणी सभा का सदस्य शामिल करने से पहले साधारण सभा से अनुमोदन प्राप्त किया जाए। इसके बाद कार्यकारिणी सभा में प्रस्ताव पारित कर दोनों बैठकों का विवरण रजिस्ट्रार, फर्म्स एवं सोसायटी को प्रस्तुत किया जाए। विधिवत संशोधन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संबंधित कार्य संपादित किए जाएं।
लेकिन आरोप है कि जीवनदीप समिति बिल्हा में इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन किए बिना ही BPM को द्वितीय हस्ताक्षरी बनाकर वित्तीय कार्य कराए जाते रहे। इस संबंध में तत्कालीन खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. शुभा गरेवाल द्वारा 22 जून 2020 को जारी पत्र क्रमांक 811 तथा 7 जून 2021 को जारी पत्र क्रमांक BMO/NHM/सु.का.अधि./2021/791 को महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया जा रहा है।
वहीं, खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. श्रीकेश गुप्ता ने अपने पत्र क्रमांक ज.सु.अ./2026/1011, दिनांक 20 जुलाई 2026 में प्रमाणित किया है कि BPM को द्वितीय हस्ताक्षरी बनाए जाने संबंधी कोई प्रस्ताव साधारण सभा की बैठक में प्रस्तुत नहीं किया गया और न ही इस संबंध में द्वितीय हस्ताक्षरी बनाए जाने का कोई अभिलेख कार्यालय में संधारित है।
जब प्रस्ताव नहीं, तो बैंक में हस्ताक्षर का अधिकार कैसे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब साधारण सभा में प्रस्ताव पारित नहीं हुआ, कार्यकारिणी सभा से अनुमोदन नहीं मिला और कार्यालय में अधिकृत अभिलेख तक उपलब्ध नहीं है, तो BPM अनिल गढ़ेवाल को जीवनदीप समिति के वित्तीय लेनदेन में द्वितीय हस्ताक्षरी का अधिकार किस आधार पर दिया गया? आरोप है कि बैंक को भी अनिल गढ़ेवाल को द्वितीय हस्ताक्षरी अधिकृत किए जाने संबंधी कोई औपचारिक पत्र नहीं भेजा गया, इसके बावजूद चेकों पर उनके हस्ताक्षर कराकर धनराशि का आहरण किया जाता रहा।
मामले में एक और गंभीर पहलू BPM अनिल गढ़ेवाल की संविदा सेवा अवधि से जुड़ा है। आरोप है कि जनवरी 2018 से वर्ष 2026 तक उनके पद पर सेवा वृद्धि के लिए मिशन संचालक NHM छत्तीसगढ़ से विधिवत आदेश उपलब्ध नहीं होने के बावजूद उनसे समिति के वित्तीय एवं प्रशासनिक कार्य संपादित कराए जाते रहे। ऐसे में यह जांच का विषय है कि उनकी नियुक्ति, सेवा विस्तार और वित्तीय अधिकारों की वैधानिक स्थिति क्या थी तथा किस अधिकारी ने उन्हें इन कार्यों के लिए अधिकृत किया?
अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन BMO डॉ. शुभा गरेवाल, डॉ. श्रीकेश गुप्ता और वर्तमान खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. निकिता कंवर की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। यदि BPM को द्वितीय हस्ताक्षरी बनाने का कोई वैधानिक प्रस्ताव और अधिकृत आदेश मौजूद नहीं था, तो इतने वर्षों तक उनके माध्यम से वित्तीय कार्य किसके निर्देश पर संचालित होते रहे? क्या संबंधित अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग किया? क्या समिति के बैंक खातों से जारी प्रत्येक धनादेश की विधिवत जांच की गई?
आरोपों के अनुसार, BPM और संबंधित अधिकारियों के संयुक्त हस्ताक्षरों से जीवनदीप समिति के कोष से प्रतिवर्ष लाखों रुपये का आहरण किया जाता रहा। यदि जांच में यह वित्तीय प्रक्रिया अनधिकृत और नियम विरुद्ध प्रमाणित होती है, तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ नियमों के तहत आर्थिक क्षति की वसूली भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
CMHO की निष्पक्षता पर भी उठ रहे सवाल
इस मामले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), बिलासपुर की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वित्तीय अनियमितताओं की जांच और संबंधित अधिकारियों से जवाबदेही तय कराने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों की है। लेकिन यदि पूर्व में BMO रहते हुए वर्तमान CMHO की भूमिका भी इसी तरह के वित्तीय निर्णयों में रही है, तो उनकी निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में जांच की जिम्मेदारी किसी स्वतंत्र वरिष्ठ अधिकारी अथवा जिला प्रशासन की निगरानी वाली समिति को सौंपने की मांग उठ रही है।
अब जरूरत केवल औपचारिक जांच की नहीं, बल्कि जीवनदीप समिति बिल्हा के गठन से लेकर अब तक के सभी बैंक स्टेटमेंट, चेकबुक, धनादेश, भुगतान वाउचर, कैशबुक, बैठक कार्यवाही रजिस्टर, साधारण सभा एवं कार्यकारिणी सभा के प्रस्ताव तथा BPM की नियुक्ति और सेवा विस्तार संबंधी दस्तावेजों की बारीकी से जांच करने की है।
सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों की जवाबदेही तय करेगा? क्या समिति को हुई संभावित आर्थिक क्षति की वसूली होगी या फिर विभागीय जांच की औपचारिकता के बीच जिम्मेदार लोगों को संरक्षण मिलता रहेगा? जीवनदीप समिति के वित्तीय लेनदेन की पारदर्शिता और सरकारी धन की जवाबदेही तय करने के लिए अब उच्चस्तरीय जांच अनिवार्य नजर आती है।















































