मेडिकल कॉलेज के अधूरे भवन पर गरमाई सियासत: भाजपा-कांग्रेस के बीच वार-पलटवार, छात्रों और मरीजों की मुश्किलें बरकरार
अंबिकापुर:
ओपी चौधरी का कांग्रेस पर निशाना
प्रदेश के वित्त मंत्री और जिले के प्रभारी मंत्री ओपी चौधरी ने निर्माण कार्य में हुई देरी के लिए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। सरगुजा प्रवास के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासनकाल में विभागीय तालमेल की कमी और शीर्ष नेतृत्व के आपसी विवादों के कारण इस महत्वपूर्ण परियोजना को लटकाकर रखा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान सरकार ने अब इसे प्राथमिकता सूची में रखा है और 100 करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त राशि स्वीकृत कर निर्माण एजेंसी को कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।
टीएस सिंहदेव का पलटवार
वित्त मंत्री के आरोपों का जवाब देते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने भाजपा सरकार पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि राज्य में भाजपा की सरकार बने ढाई साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन काम की रफ्तार जस की तस बनी हुई है। सिंहदेव ने याद दिलाया कि कांग्रेस शासन के दौरान ही मेडिकल कॉलेज की स्थापना, अस्पताल भवन का शिलान्यास और पीजी पाठ्यक्रमों की शुरुआत हुई थी। उन्होंने निर्माण पूरा करने की जिम्मेदारी अब वर्तमान सरकार पर डाली।
366 करोड़ का निवेश, फिर भी निर्माण अधूरा
अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज परियोजना पर अब तक लगभग 366 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद भवन पूरी तरह तैयार नहीं है। अतिरिक्त बजट के अभाव और निर्माण एजेंसी की सुस्ती के कारण यह परियोजना निर्धारित समय सीमा से काफी पीछे चल रही है।
छात्रों के भविष्य और मरीजों के स्वास्थ्य पर संकट
भवन अधूरा होने का सबसे बुरा असर शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है:
- शिक्षा पर ग्रहण: कॉलेज को अब तक दो बार ‘जीरो ईयर’ का सामना करना पड़ा है, जिससे एमबीबीएस छात्रों की क्लिनिकल ट्रेनिंग और पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है।
- मान्यता का डर: नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के कड़े मानकों को पूरा करने में कॉलेज प्रबंधन को लगातार दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
- मरीजों की असुविधा: कॉलेज के साथ संबद्ध जिला अस्पताल पर दबाव बना हुआ है, जिससे मरीजों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
निष्कर्ष:
भाजपा और कांग्रेस के बीच जारी इस सियासी खींचतान के बीच आम जनता और मेडिकल छात्र एक ही सवाल पूछ रहे हैं—आखिर यह महत्वाकांक्षी परियोजना कब पूरी होगी और उन्हें इसका वास्तविक लाभ कब मिलेगा?



