सरोज पाण्डेय होने के मायने…निर्जीव संगठन को मिली प्राण-वायु, नए राजनीतिक समीकरणों से कांग्रेसियों में बेचैनी

नरेश सोनी

दुर्ग। भीतर से टूट चुकी और बिखरने के लगभग करीब पहुंची दुर्ग भाजपा को राज्यसभा सांसद सरोज पाण्डेय ने नया संबल दिया है। घर बैठे हताश-निराश कार्यकर्ताओं में आस जगी है। जो संगठन लम्बे समय से करीब-करीब शून्य था, उसमें भी नयी ताजगी और स्फूर्ती आई है। लोगों को उम्मीद की एक नई किरण दिख रही है कि बहुत जल्द दुर्ग को उन नामुरादों से छुटकारा मिलेगा जो काम तो कुछ नहीं करते, अलबत्ता चेहरा दिखाकर और कागजी नाव चलाकर स्वयं को कोलंबस साबित करने में जुटे हैं।

दरअसल, हेमचंद यादव के बाद दुर्ग के भाजपाइयों को स्थानीय स्तर पर नेतृत्वकर्ता की दरकार थी। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में संगठन में ऐसे नेताओं को बिठाया गया, जिनके भीतर लीडरशिप का सर्वथा अभाव था। लोकसभा सांसद विजय बघेल भिलाई में रहते हैं। जाहिर है कि वे दुर्ग में ज्यादा वक्त नहीं दे पाते थे। कमोबेश यही स्थिति राज्यसभा सांसद सरोज पाण्डेय के साथ भी थी। केन्द्रीय राजनीति करने की वजह से वे भी दुर्ग को वक्त नहीं दे पा रही थीं। प्रदेश से भाजपा की सत्ता जाने के बाद जिला व जनपद पंचायत और नगर निगम भी भाजपाई हाथ से फिसलते चले गए। जब विपक्ष खत्म हो जाता है तो सत्तापक्ष निरंकुश होने लगता है। यहां भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। स्थानीय विधायक रिंग में अकेले खड़े होकर जंघा ठोंक रहे थे। भाजपा के समर्पित और जुझारू कार्यकर्ता मन मसोसकर बैठे थे, लेकिन हालात उनके वश से भी बाहर थे। वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाने की बेबसी छिपा नहीं पा रहे थे।

अगले साल के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं। पार्टी के लोगों की चिंता नेतृत्व को लेकर थी। जिन कार्यकर्ताओं ने खून-पसीना एक किया, दरी-चटाई बिछाई, झंडा लेकर जय-जयकार करते सबसे अग्रिम पंक्ति में मौजूद रहे; वे पार्टी की दुरावस्था सह नहीं पा रहे थे। चिंता से लिपटा सबसे बड़ा और अहम् सवाल यही था कि कहीं फिर से पार्टी के नेता ऐसा प्रत्याशी न दे दें, जिसके लिए खुद कार्यकर्ता एकजुट न हो पाएं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दुर्ग जिले में भाजपा कई खेमों में बँटी हुई है और इसी खेमेबाजी ने पार्टी की लुटिया डुबोने में कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी। कार्यकर्ता पहले दबी जुबान में तो अब खुलकर कहने लगे हैं कि पार्टी के नेता यदि सर्वमान्य प्रत्याशी दे तो भाजपा कभी हार ही नहीं सकती। कांग्रेस में ऐसा कोई नेता या नेतृत्वकर्ता है ही नहीं, जो भाजपा को हरा सके। भाजपा को भाजपा के ही लोग हराते हैं।

याद आई विपक्ष की भूमिका

१५ साल की भाजपाई सत्ता के दौरान पार्टी के कार्यकर्ता आंदोलन-प्रदर्शन करना शायद भूल गए थे। इतिहास गवाह है कि भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए सदैव बढिय़ा और आक्रामक राजनीति की, किन्तु इस बार साढ़े ३ साल के विपक्षी कार्यकाल में पार्टी के लोग अपना पुराना पैनापन और आक्रामकता नहीं दिखा पाए। अपने लम्बे राजनीतिक अनुभवों से सरोज पाण्डेय यह बेहतर जानतीं हैं कि भोथरे अों से गहरे घाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। पार्टी के लगातार घटते जनाधार को वापस पाने और हतोत्साहित कार्यकर्ताओं में ओज पैदा करने के लिए जरूरी था कि कार्यकर्ता रूपी अों को फिर से पैना किया जाए। बुधवार को नगर निगम और स्थानीय विधायक के खिलाफ जो हल्ला बोला गया, उससे कार्यकर्ताओं को जाहिर तौर पर संजीवनी मिलेगी। कई लोग इसे सरोज पाण्डेय गुट का शक्ति प्रदर्शन बता रहे हैं, लेकिन जब संगठन शून्य की ओर बढ़ रहा हो तो कोई भी बड़ा आंदोलन, पार्टी के लिए ही प्राण-वायु साबित होता है। चाहे वह किसी गुट-विशेष द्वारा आयोजित ही क्यों न हो।

एक सवाल…. क्या सरोज लड़ेंगी विधानसभा चुनाव?

बुधवार को नगर निगम के खिलाफ किए गए आंदोलन के बाद सबसे जेहन में एक ही सवाल है कि क्या सरोज पांडेय दुर्ग से विधानसभा का चुनाव लड़ेंगी? इस सवाल का जवाब खुद सरोज पाण्डेय ने प्रदर्शन के दौरान दिया। उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा,- शुरूआत उन्होंने दुर्ग से जरूर की है, लेकिन वे लड़ेंगी सभी ९० सीटों से। सुश्री पाण्डेय के इस बयान के वैसे तो कई मायने निकलते हैं। लेकिन एक साफ और स्पष्ट संकेत यह है कि वे एक बड़ी लीडर हैं और सीएम पद के लिए प्रबल दावेदार भी हैं। छत्तीसगढ़ भाजपा में फिलहाल प्रभावी लीडरशिप का अभाव है। संभावना है कि बहुमत के हालातों में शायद डॉ. रमन को सीएम न बनाया जाए। इधर, सुश्री पाण्डेय का राज्यसभा का कार्यकाल भी २०२४ को खत्म हो जाएगा। माना जा रहा है कि पार्टी उन्हें भी शायद ही रिपीट करे। ऐसे में सुश्री पाण्डेय के समक्ष दुर्ग से भाग्य आजमाने का बेहतरीन विकल्प मौजूद है।

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