12 नवंबर से ड्राइवरों का ‘स्टेयरिंग छोड़ो आंदोलन’, थमे पहिए तो जनजीवन से लेकर अर्थव्यवस्था तक पड़ेगा असर!
ड्राइवर आयोग, 20 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा, पेंशन समेत पांच सूत्रीय मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान; माल परिवहन, यात्री बसों, स्कूल वाहनों और आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति पर मंडरा सकता है संकट
अनिल शुक्ला @ बिलासपुर। देशभर में परिवहन व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ड्राइवरों ने अब अपनी मांगों को लेकर बड़े आंदोलन का ऐलान कर दिया है। ऑल इंडिया ड्राइवर ज्वाइंट कमेटी एवं छत्तीसगढ़ ड्राइवर महा संगठन ने 12 नवंबर 2026 से अनिश्चितकालीन ‘स्टेयरिंग छोड़ो आंदोलन’ शुरू करने की घोषणा की है। संगठन की अपील है कि देश और प्रदेश के सभी ड्राइवर अपनी गाड़ियां खड़ी कर आंदोलन में शामिल हों। यदि यह आंदोलन व्यापक रूप लेता है और मालवाहक ट्रकों से लेकर यात्री बसों, टैक्सी, ऑटो तथा अन्य व्यावसायिक वाहनों के पहिए थमते हैं तो इसका असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाजार, उद्योग, व्यापार, कृषि, शिक्षा और आम जनजीवन भी प्रभावित हो सकता है।
बिलासपुर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि ड्राइवर लंबे समय से सामाजिक सुरक्षा, दुर्घटना बीमा, पेंशन और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। इसी वजह से अब अनिश्चितकालीन आंदोलन का रास्ता चुना गया है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लेती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
थमे ट्रकों के पहिए तो उद्योग और बाजार पर पड़ेगा सीधा असर
ड्राइवर आंदोलन का सबसे व्यापक असर माल परिवहन पर पड़ने की आशंका है। ट्रकों और भारी वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने पर कोयला, सीमेंट, स्टील, खाद्यान्न, सब्जियां, फल, पेट्रोलियम उत्पाद और अन्य औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। छत्तीसगढ़ जैसे खनिज और औद्योगिक उत्पादन वाले राज्य में इसका असर विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
कोयला खदानों से बिजली संयंत्रों और उद्योगों तक कोयले की ढुलाई प्रभावित होने पर बिजली उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि आंदोलन में कितने वाहन शामिल होते हैं और कंपनियों के पास कितने दिनों का भंडार उपलब्ध है।
सीमेंट और इस्पात उद्योगों में कच्चे माल तथा तैयार उत्पादों की ढुलाई प्रभावित होने से उत्पादन, डिस्पैच और निर्माण कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। वहीं व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक सामान नहीं पहुंचने से बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका रहेगी।
पेट्रोल-डीजल से लेकर सब्जियों तक आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा
यदि टैंकर चालकों ने भी आंदोलन में भाग लिया तो पेट्रोल पंपों तक पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी तरह सब्जियों, फलों, दूध और अन्य जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं की ढुलाई बाधित होने पर शहरों के खुदरा बाजार में कमी और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
हालांकि पेट्रोलियम कंपनियों, स्थानीय प्रशासन और आपूर्ति एजेंसियों के पास वैकल्पिक व्यवस्था तथा भंडारण की क्षमता होने से इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं होगा। लेकिन लंबा आंदोलन इन व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा सकता है।
बस, टैक्सी और स्कूल वाहन बंद हुए तो आम आदमी की बढ़ेगी परेशानी
यात्री परिवहन में शामिल बस, टैक्सी, ऑटो और अन्य व्यावसायिक वाहन आंदोलन में शामिल होते हैं तो नौकरीपेशा लोगों, विद्यार्थियों, मरीजों और रोजाना यात्रा करने वाले नागरिकों को सबसे ज्यादा परेशानी हो सकती है। स्कूल बस और वैन सेवाएं प्रभावित होने पर बच्चों को स्कूल पहुंचाने की जिम्मेदारी अभिभावकों पर आ सकती है।
रेलवे और हवाई सेवाएं सीधे इस आंदोलन के दायरे में नहीं आएंगी, लेकिन सड़क परिवहन बाधित होने से रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट तक पहुंचने वाले यात्रियों को भी वैकल्पिक साधनों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
निर्माण कार्य, कृषि और छोटे कारोबार भी होंगे प्रभावित
निर्माण स्थलों तक रेत, गिट्टी, सीमेंट, सरिया और अन्य सामग्री नहीं पहुंचने पर भवन निर्माण, सड़क परियोजनाओं और सरकारी विकास कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है। कृषि क्षेत्र में खाद, बीज और अन्य आवश्यक सामग्री की आपूर्ति तथा खेतों से मंडियों तक उपज पहुंचाने में भी बाधाएं आ सकती हैं।
छोटे दुकानदारों, थोक व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों और उन कारोबारियों पर भी इसका असर पड़ सकता है, जिनका व्यवसाय नियमित माल ढुलाई पर निर्भर है। लंबा आंदोलन दैनिक मजदूरी और रोजगार से जुड़े लोगों की आमदनी को भी प्रभावित कर सकता है।
पांच सूत्रीय मांगों पर सरकार से आर-पार की लड़ाई
संगठन ने ड्राइवरों के हित में पांच प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें स्वतंत्र ड्राइवर आयोग और कल्याण बोर्ड का गठन, प्रत्येक ड्राइवर को 20 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा, 60 वर्ष की आयु के बाद पेंशन, सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में निष्पक्ष न्याय और ड्राइवरों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार तथा 1 सितंबर को राष्ट्रीय ड्राइवर दिवस घोषित कर शासकीय अवकाश देने की मांग शामिल है।
संगठन का कहना है कि ड्राइवर दिन-रात सड़क पर रहकर देश की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, लेकिन दुर्घटना, बीमारी, बुढ़ापे और परिवार की आर्थिक सुरक्षा के मामले में उनके लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। ऐसे में ड्राइवरों के लिए अलग आयोग और कल्याण बोर्ड बनाकर उनकी समस्याओं का संस्थागत समाधान किया जाना चाहिए।
सरकार और प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती
इस आंदोलन के ऐलान ने सरकार और प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ ड्राइवरों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याण से जुड़ी मांगों पर विचार करना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ परिवहन व्यवस्था ठप होने की स्थिति में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, अस्पतालों, औद्योगिक इकाइयों और आम नागरिकों की जरूरतों को बनाए रखना भी बड़ी जिम्मेदारी होगी।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि 12 नवंबर से पहले सरकार और संगठन के बीच कोई वार्ता होती है या नहीं। यदि आंदोलन अनिश्चितकाल तक चलता है तो इसका प्रभाव प्रदेश की अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर कितना व्यापक होगा, यह ड्राइवरों की भागीदारी और आंदोलन की अवधि तय करेगी।
‘अबकी बार आर-पार, ड्राइवर एकता जिंदाबाद’ के नारे के साथ संगठन ने देशभर के ड्राइवरों से एकजुट होने की अपील की है। आंदोलन से संबंधित जानकारी के लिए संगठन ने मोबाइल नंबर 8085401673, 7225997263 और 7222962010 जारी किए हैं।


