पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई बोले- न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नगण्य, सेवानिवृत्ति के बाद नहीं लूंगा कोई सरकारी पद

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने न्यायपालिका, भ्रष्टाचार, धर्मनिरपेक्षता और सेवानिवृत्ति के बाद की भूमिका जैसे विभिन्न मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। एक विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि देश की अन्य संस्थाओं की तुलना में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मामले बेहद कम हैं और न्यायिक व्यवस्था लगातार खुद में सुधार करती रहती है।

‘कॉकरोच’ टिप्पणी विवाद पर दी प्रतिक्रिया

हाल के दिनों में न्यायपालिका से जुड़े कुछ बयानों को लेकर हुए विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए बीआर गवई ने कहा कि अदालत की कार्यवाही के दौरान कई बार अनजाने में कुछ शब्द निकल जाते हैं, जिन्हें संदर्भ से हटाकर पेश किया जाता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में किसी भी टिप्पणी को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर विवाद खड़ा कर दिया जाता है, जबकि उसका वास्तविक संदर्भ अलग होता है।

धर्मस्थलों पर जाने को लेकर कही यह बात

बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मुलाकात को लेकर हुई आलोचनाओं पर गवई ने कहा कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका पालन-पोषण धर्मनिरपेक्ष वातावरण में हुआ है और वे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा तथा दरगाह सहित सभी धर्मस्थलों पर जाते हैं। उनके अनुसार संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और उपासना की स्वतंत्रता देता है।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर क्या बोले?

पूर्व सीजेआई ने कहा कि यह सच है कि कोई भी व्यवस्था पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं होती, लेकिन अन्य क्षेत्रों की तुलना में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का स्तर काफी कम है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य सत्ता चलाना नहीं बल्कि जनता का विश्वास बनाए रखना और संविधान की रक्षा करना है।

रिटायरमेंट के बाद राजनीति से दूरी

सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी या राजनीतिक पद स्वीकार करने के सवाल पर बीआर गवई ने स्पष्ट कहा कि यह व्यक्तिगत निर्णय होता है, लेकिन उन्होंने वर्षों पहले ही तय कर लिया था कि न्यायिक सेवा समाप्त होने के बाद कोई सरकारी पद स्वीकार नहीं करेंगे। उनका मानना है कि यदि किसी पद की अपेक्षा नहीं होती तो निर्णय लेते समय मन पूरी तरह स्वतंत्र रहता है।

अब परिवार और शौक को दे रहे समय

गवई ने स्वीकार किया कि न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हुए परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाए। उन्होंने बताया कि न्यायिक कार्य केवल अदालत के समय तक सीमित नहीं होता, बल्कि मामलों की तैयारी और अध्ययन में भी काफी समय लगता है। अब सेवानिवृत्ति के बाद वे परिवार के साथ समय बिताने के अलावा टेनिस और तैराकी जैसे अपने पसंदीदा शौक पूरे कर रहे हैं।

पूर्व सीजेआई ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संविधान का सम्मान और जनता का भरोसा ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।

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