धान छोड़ रागी की खेती से बढ़ी आमदनी, लैलूंगा के आदिवासी किसानों ने पेश की नई मिसाल

रायगढ़। लैलूंगा विकासखंड के वनांचल ग्राम फुठामुड़ा के आदिवासी किसानों ने ग्रीष्मकालीन धान की खेती छोड़कर रागी (मड़ुआ) की खेती अपनाई है। कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) के सहयोग से शुरू हुई यह पहल अब किसानों की आय बढ़ाने का सफल मॉडल बनकर उभर रही है।

गोसाई राम राठिया की पहल से बदली तस्वीर

प्रगतिशील किसान गोसाई राम राठिया के नेतृत्व में गांव के किसानों को संगठित कर ग्रीष्मकाल में कम पानी और कम लागत वाली रागी की सामुदायिक खेती शुरू कराई गई। विभागीय मार्गदर्शन और वैज्ञानिक खेती पद्धति से किसानों को पहली ही फसल में बेहतर उत्पादन प्राप्त हुआ।

45 क्विंटल रागी बीज की पहली खेप बेची

बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए किसानों का पंजीयन छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के बीज उत्पादन कार्यक्रम में कराया गया। घरेलू उपयोग के लिए पर्याप्त रागी सुरक्षित रखने के बाद किसानों ने 45 क्विंटल उच्च गुणवत्ता वाले रागी बीज की पहली खेप निगम को विक्रय की।

कम लागत, अधिक लाभ

कृषि विभाग के अनुसार रागी की खेती में धान की तुलना में कम पानी और कम लागत की आवश्यकता होती है। इससे किसानों की उत्पादन लागत घट रही है और बेहतर आमदनी मिलने लगी है। साथ ही मोटे अनाज के उत्पादन को भी बढ़ावा मिल रहा है।

दूसरे किसानों के लिए बनी प्रेरणा

गोसाई राम राठिया की पहल से अब गांव के कई अन्य किसान भी रागी की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। विभाग का मानना है कि फुठामुड़ा की यह सफलता बताती है कि तकनीकी मार्गदर्शन, योजनाओं का लाभ और किसानों की सहभागिता से खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।:::

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