एक तरफ मातम, दूसरी तरफ दावत; रायगढ़ में राजनीतिक ‘लॉन्चिंग’ को लेकर उठे सवाल

कांग्रेस विधायक विद्यावती सिदार के पति के निधन और अंतिम संस्कार के दिन ही वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के लिए दावत, क्या यह राजनीतिक शिष्टाचार के अनुरूप है?

रायगढ़ |

रायगढ़ की राजनीति में रविवार का दिन एक ओर जहां शोक और संवेदना का रहा, वहीं दूसरी ओर एक राजनीतिक दावत को लेकर कई तरह के सवाल भी खड़े हो गए हैं। लैलूंगा विधानसभा क्षेत्र की कांग्रेस विधायक श्रीमती विद्यावती सिदार के पति श्री कुंजबिहारी सिदार का निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और रायपुर के निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन के बाद रविवार को उनके पैतृक गांव कुंजेमुरा में अंतिम संस्कार किया गया।

एक ओर कांग्रेस परिवार से जुड़े एक जनप्रतिनिधि के घर में मातम का माहौल था, वहीं दूसरी ओर रायगढ़ जिले के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, जो पूर्व विधायक और छत्तीसगढ़ शासन में मंत्री भी रह चुके हैं, की ओर से रविवार शाम कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के लिए दावत रखे जाने की चर्चा है।

यह कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं बताया जा रहा, बल्कि संबंधित नेता की ओर से आयोजित दावत है। लेकिन जिस समय यह आयोजन हो रहा है और जिन लोगों को इसमें आमंत्रित किया गया है, उसने इस पूरे मामले को सामान्य दावत से आगे बढ़ाकर राजनीतिक शिष्टाचार, संवेदनशीलता और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जुड़े सवालों के केंद्र में ला दिया है।

जिस दिन पार्टी की विधायक के घर मातम, उसी दिन राजनीतिक जमावड़ा?

राजनीति में मतभेद अपनी जगह होते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों में भी कुछ सामाजिक और मानवीय मर्यादाएं मानी जाती हैं। खासकर तब, जब किसी पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधि के परिवार में मृत्यु हुई हो।

यहां सवाल किसी के घर दावत देने या भोजन करने के अधिकार का नहीं है। सवाल समय और परिस्थिति का है।

जब उसी जिले की कांग्रेस विधायक श्रीमती विद्यावती सिदार के पति का उसी दिन निधन हुआ हो, अंतिम संस्कार भी उसी दिन हुआ हो और परिवार शोक में डूबा हो, तब उसी शाम जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को बुलाकर दावत आयोजित करना क्या राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता के अनुरूप माना जाएगा?

क्या ऐसे अवसर पर कार्यक्रम टाला नहीं जा सकता था?

क्या पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की प्राथमिकता उस समय अपने ही दल की महिला विधायक और उनके शोकाकुल परिवार के साथ खड़े होने की नहीं होनी चाहिए थी?

ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि राजनीतिक शिष्टाचार और संवेदनशीलता को लेकर उठते स्वाभाविक सवाल हैं।


दावत के पीछे राजनीति कितनी और सामाजिकता कितनी?

मामला यहीं समाप्त नहीं होता।

इस दावत को लेकर दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण सवाल इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है।

बताया जा रहा है कि जिस वरिष्ठ नेता की ओर से यह दावत रखी गई है, वे अपने पुत्र को राजनीति में आगे लाने की तैयारी में हैं। ऐसे में जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को एक साथ आमंत्रित किए जाने को केवल सामान्य मेल-मिलाप की दावत मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।

राजनीति में किसी नए व्यक्ति का प्रवेश कोई असामान्य बात नहीं है। हर व्यक्ति को लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति करने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। किसी नेता का बेटा राजनीति में आए, इसमें भी अपने आप कोई आपत्ति नहीं हो सकती।

लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब किसी नए राजनीतिक चेहरे को उसके पिता की वर्षों पुरानी राजनीतिक पहचान, संपर्क और प्रभाव के सहारे आगे बढ़ाने की कवायद शुरू होती दिखाई दे।

क्या यह केवल दावत है?

या फिर इसके बहाने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच आने वाली पीढ़ी के राजनीतिक चेहरे का परिचय और स्वीकार्यता बनाने की कोशिश भी है?

अगर ऐसा है तो इसे लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।


वर्षों से पार्टी के लिए मेहनत कर रहे कार्यकर्ताओं का क्या?

कांग्रेस में ऐसे हजारों कार्यकर्ता हैं जो वर्षों से संगठन के लिए काम करते आए हैं।

किसी ने बूथ संभाला है, किसी ने चुनाव में प्रचार किया है।
किसी ने पोस्टर लगाए हैं तो किसी ने झंडे उठाए हैं।
किसी ने पार्टी के मुश्किल दौर में संगठन का साथ नहीं छोड़ा।
किसी ने वर्षों तक नेताओं के पीछे खड़े होकर पार्टी के लिए जमीन तैयार की।

कई कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी पूरी राजनीतिक उम्र पार्टी के लिए खपा दी, लेकिन उन्हें कभी वह अवसर नहीं मिला जिसका वे लंबे समय से इंतजार करते रहे।

ऐसे में यदि किसी स्थापित राजनीतिक परिवार के बेटे को अचानक राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने की कोशिश होती है तो उन कार्यकर्ताओं के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या वर्षों की संगठनात्मक मेहनत से ज्यादा महत्वपूर्ण किसी नेता का राजनीतिक परिवार होना है?

क्या पार्टी में आगे बढ़ने का रास्ता संगठन में काम करने से बनेगा या राजनीतिक विरासत से?

और सबसे बड़ा सवाल—

जो कार्यकर्ता वर्षों से पार्टी के लिए अपना समय, श्रम और राजनीतिक जीवन दे रहे हैं, उनके लिए इस तरह की राजनीतिक ‘लॉन्चिंग’ क्या संदेश देती है?


कार्यकर्ता को सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाएगा?

राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी ताकत उनके कार्यकर्ता होते हैं। चुनाव के समय यही कार्यकर्ता घर-घर जाते हैं, बूथ संभालते हैं, मतदाताओं से संपर्क करते हैं और संगठन को जमीन पर मजबूत करते हैं।

लेकिन जब नेतृत्व की अगली कतार तय करने की बात आती है तो यदि किसी स्थापित नेता के परिवार के सदस्य को प्राथमिकता मिलने लगे, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि संगठन में वर्षों से काम करने वाले सामान्य कार्यकर्ता की राजनीतिक यात्रा का मूल्यांकन किस आधार पर होगा?

क्या वह केवल चुनाव के समय जरूरी है?

क्या उसकी भूमिका सिर्फ झंडा उठाने, पोस्टर लगाने और बूथ संभालने तक सीमित रहेगी?

या पार्टी के भीतर उसे भी आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिलेगा?

यही वह बिंदु है जहां यह दावत महज एक दावत न रहकर कांग्रेस के भीतर राजनीतिक अवसरों और उत्तराधिकार की बहस से जुड़ जाती है।


राजनीतिक विरासत कोई बुरी बात नहीं, लेकिन जनाधार की परीक्षा जरूरी

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी का राजनीति में आना अपने आप में गलत नहीं है।

देश की राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां नेताओं की अगली पीढ़ी राजनीति में आई और उसने अपने दम पर पहचान बनाई।

लेकिन अंतर यहां है।

नाम रास्ता खोल सकता है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए जनाधार चाहिए।

पिता की पहचान से पहली मुलाकात आसान हो सकती है।
वरिष्ठ नेताओं से संपर्क आसान हो सकता है।
संगठन में प्रवेश आसान हो सकता है।
राजनीतिक मंच मिल सकता है।

लेकिन अंततः चुनाव में मतदाता यह नहीं देखता कि उम्मीदवार किसका बेटा है। वह यह भी देखता है कि उसने खुद जनता के बीच क्या काम किया है।

यही कारण है कि राजनीतिक विरासत की असली परीक्षा किसी बंद कमरे की बैठक या दावत में नहीं, बल्कि जनता के बीच होती है।


वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी क्या संदेश देती है?

इस दावत का एक और पहलू महत्वपूर्ण है।

यदि किसी संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से जिले के वरिष्ठ नेताओं को एक साथ आमंत्रित किया जाता है और वे वहां उपस्थित होते हैं, तो इसका राजनीतिक संदेश क्या होगा?

क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों का सम्मान होगा?

या फिर इसे संगठन के भीतर उस नए चेहरे के लिए समर्थन जुटाने की शुरुआत के रूप में देखा जाएगा?

राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं।

कौन किसके साथ बैठा है, कौन किसके कार्यक्रम में पहुंचा है, किसके साथ तस्वीर आई है और किसे वरिष्ठ नेता अपना समय दे रहे हैं—इन सबका अपना राजनीतिक संदेश होता है।

इसीलिए इस दावत को लेकर चर्चाएं होना स्वाभाविक है।


सवाल दावत का नहीं, राजनीतिक संस्कृति का है

यहां आलोचना का विषय यह नहीं होना चाहिए कि किसी ने दावत क्यों दी।

किसी व्यक्ति को निजी तौर पर लोगों को भोजन के लिए बुलाने का अधिकार है।

सवाल दो हैं।

पहला—क्या उसी दिन, जब उसी पार्टी की विधायक के पति का निधन हुआ और अंतिम संस्कार हुआ, ऐसी दावत आयोजित करना उचित राजनीतिक संवेदनशीलता का उदाहरण है?

दूसरा—क्या इस दावत के माध्यम से किसी राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी को कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच स्थापित करने की कोशिश हो रही है?

यदि दोनों सवालों के जवाब हां की दिशा में जाते हैं, तो यह सिर्फ एक शाम की दावत नहीं रह जाती। यह कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति, कार्यकर्ताओं की भूमिका और आने वाले समय में नेतृत्व की दिशा पर सवाल खड़े करने वाली घटना बन जाती है।


आखिर कार्यकर्ता किसका वारिस?

कांग्रेस के किसी सामान्य कार्यकर्ता से पूछा जाए कि उसने पार्टी के लिए क्या किया है, तो उसके पास शायद वर्षों की लंबी कहानी होगी।

लेकिन जब उससे पूछा जाए कि उसे बदले में क्या मिला, तो शायद जवाब उतना लंबा न हो।

यही राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

कार्यकर्ता पार्टी की विचारधारा का वाहक है, लेकिन क्या नेतृत्व की विरासत का भी हिस्सेदार है?

यदि कोई कार्यकर्ता 10-20 साल पार्टी के लिए काम करता है, तो क्या उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का भी सम्मान होगा?

या फिर राजनीति में एक अलग रास्ता हमेशा उन लोगों के लिए खुला रहेगा जिनके पास पहले से किसी बड़े नेता का नाम और राजनीतिक विरासत मौजूद है?

यही सवाल आज रायगढ़ की कांग्रेस की राजनीति में चर्चा का विषय बन सकता है।


लॉन्चिंग आसान, लैंडिंग मुश्किल

किसी नए राजनीतिक चेहरे को वरिष्ठ नेताओं के बीच पेश करना आसान है।

दावत में लोग आएंगे।
मुलाकात होगी।
तस्वीरें बनेंगी।
चर्चाएं होंगी।
समर्थन का माहौल तैयार होगा।

इसे राजनीतिक लॉन्चिंग कहा जा सकता है।

लेकिन असली राजनीति उसके बाद शुरू होगी।

जब यही चेहरा जनता के बीच जाएगा।

जब कार्यकर्ताओं के बीच बैठेगा।

जब बूथ स्तर के कार्यकर्ता उसके साथ खड़े होंगे।

जब जनता से वोट मांगेगा।

और जब चुनाव का परिणाम सामने आएगा।

तब पता चलेगा कि उसके पास राजनीतिक विरासत है या अपना जनाधार भी।

क्योंकि राजनीति में पिता का नाम शुरुआत दिला सकता है, लेकिन जनता का भरोसा खुद कमाना पड़ता है।

और शायद इस पूरे घटनाक्रम पर सबसे सटीक सवाल यही है—

एक तरफ उसी पार्टी की विधायक के घर आज मातम है, दूसरी तरफ उसी जिले में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के लिए दावत और संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी की लॉन्चिंग की चर्चा है। सवाल सिर्फ इतना है—क्या यह समय, तरीका और संदेश कांग्रेस के उन हजारों कार्यकर्ताओं के साथ न्याय करता है, जो वर्षों से पार्टी के लिए अपना राजनीतिक जीवन खपा रहे हैं?

रायगढ़ की राजनीति में दावत की प्लेट भले कुछ घंटों में खाली हो जाए, लेकिन उससे उठे राजनीतिक सवालों का जवाब शायद लंबे समय तक तलाशा जाएगा।

**क्योंकि राजनीति में विरासत मिल सकती है, पहचान मिल सकती है, मंच मिल सकता है—लेकिन कार्यकर्ताओं का सम्मान और जनता का भरोसा केवल मेहनत से ही हासिल होता है।**

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