बारिश भारी आक्रोश भारी एस ई सी एल के खदान विस्तार पर भड़के ग्रामीण, मंगलवार की जनसुनवाई पर लटकी तलवार


कुड़ेकेला :-देश और दुनिया के कोने-कोने को अपनी सांसों से रौशन करने वाली कोयला खदानें जिनके पेट से निकली ऊर्जा से बड़े बड़े शहर जगमगाते हैं आज उन्हीं खदानों के मुहाने पर बसे ग्रामीण अंधेरे उपेक्षा और छलावे के साए में जीने को मजबूर हैं। एसईसीएल के खदान विस्तारीकरण को लेकर आगामी मंगलवार को होने वाली जनसुनवाई से ठीक तीन दिन पहले इलाके का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। हालत यह है कि विरोध की प्रचंड आग के बीच अब तक जनसुनवाई का पंडाल तक नहीं लग सका है।
शुक्रवार को जब आसमान से मूसलाधार बारिश आफत बनकर बरस रही थी तब दूसरी तरफ विस्थापित और प्रभावित परिवारों का गुस्सा उससे भी तेज बरस रहा था। हाथों में तख्तियां और आंखों में दशकों से ठगे जाने का दर्द लिए पानी में भीगते हुए बच्चे बुजुर्ग और महिलाएं अपनी जमीन और हक की लड़ाई के लिए डटे रहे।
दशकों का दर्द और दस सूत्रीय हुंकार :-ग्रामीणों का आरोप है कि एस ई सी एल ने सालों साल उनसे सिर्फ वादे किए लेकिन बदले में दिए तो बस धूल धुआं प्रदूषित पानी और उजड़े हुए आशियाने। हमारी जमीन से कोयला निकालकर दुनिया को ऊर्जा दी जा रही है और हम अपने ही घर में बुनियादी सुविधाओं की भीख मांगने को मजबूर हैं। यह टीस हर प्रभावित ग्रामीण के चेहरे पर साफ नजर आ रही है।
अपनी जलती हुई जमीनों के वजूद को बचाने के लिए ग्रामीणों ने प्रबधन के सामने अपनी 10 सूत्रीय मांगें रख दी हैं जिन पर कोई भी समझौता करने को वे तैयार नहीं हैं।
पुनर्वास व सही मुआवजा जमीन और मकानों का दोबारा निष्पक्ष सर्वे कराया जाए।
पक्का रोजगार हर प्रभावित परिवार के कम से कम एक सदस्य को स्थायी नौकरी दी जाए।सड़क और परिवहन खस्ताहाल सड़कों से मुक्ति और स्कूली बच्चों के लिए बस सुविधा चालू की जाए।
मूलभूत सुविधाएं स्वच्छ पेयजल अबाध बिजली और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था तुरंत मिले।
शिक्षा और भविष्य प्रभावित क्षेत्र के बच्चों के लिए सर्वसुविधायुक्त स्कूल और छात्रवृत्ति का प्रावधान हो।
क्या हो पाएगी मंगलवार की जनसुनवाई:-अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या एस ई सी एल प्रबंधन उबलते हुए इस जन आक्रोश को शांत कर पाएगा।
जनसुनवाई में महज 72 घंटे का वक्त बचा है लेकिन धरातल पर विरोध का आलम यह है कि प्रशासन और प्रबंधन के हाथ पांव फूले हुए हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है कि पहले हमारी दस सूत्रीय मांगों पर ठोस और धरातल पर अमल करो वरना खदान का एक इंच विस्तार भी नहीं होने देंगे।
अगर एस ई सी एल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने समय रहते ग्रामीणों से संवाद साधकर उनकी वाजिब मांगों पर न्यायपूर्ण रुख नहीं अपनाया तो मंगलवार की जनसुनवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी या फिर एक बड़े उग्र आंदोलन का रूप ले लेगी। गेंद अब एस ई सी एल प्रबंधन के पाले में है देखना यह है कि वे वार्ता की टेबल पर समाधान निकालते हैं या विरोध की इस ज्वाला में खदान विस्तारीकरण का पूरा प्लान झुलस जाता है।

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