
विशेष कार्यों के लिए सम्मानित, लेकिन स्कूल में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित
रायगढ़। शासकीय माध्यमिक शाला सराईपाली में पदस्थ मास्टर ट्रेनर विकास रंजन सिन्हा को गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर जिला प्रशासन द्वारा प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि उनके छात्रों की पढ़ाई अपूर्ण और बाधित रही है।
मास्टर ट्रेनर महीने में केवल 8-10 दिन स्कूल में, छात्र ट्यूशन या स्वयं अध्ययन के भरोसे
सूत्रों के अनुसार विकास रंजन सिन्हा महीने में महज 8 से 10 दिन ही स्कूल पहुंचते हैं। शेष दिनों में वे विशेष सरकारी कार्यों या निजी कारणों से अनुपस्थित रहते हैं। नतीजा यह है कि छात्रों को उनके विषयों की पढ़ाई ट्यूशन या स्वयं अध्ययन पर निर्भर रहकर करनी पड़ती है।
- नियमित कक्षाओं का अभाव
- अधूरा पाठ्यक्रम
- परीक्षा का दबाव सीधे छात्रों पर
क्या विशेष कार्यों में सक्रियता ही शिक्षक की पूरी जिम्मेदारी बन गई?
सवाल उठता है कि क्या शिक्षक का पहला दायित्व बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना नहीं होना चाहिए। क्या ऐसे शिक्षक को सम्मानित करना उन छात्रों के साथ अन्याय नहीं है, जिनका भविष्य सीधे उनके मार्गदर्शन पर निर्भर है?
प्रशासनिक प्राथमिकताएं बन रही चुनौती
जमीनी हकीकत यह दर्शाती है कि प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार केवल कागजों में उपलब्धि दिखाते हैं, जबकि छात्र अभी भी अपने शिक्षक की राह ताकते हैं। यह मामला केवल एक शिक्षक का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
- क्या शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रमाण पत्र बन गए हैं?
- क्या बच्चों का भविष्य केवल फाइलों और मंचों तक सीमित रह गया है?
शिक्षा व्यवस्था को चाहिए सुधार और सच्ची समीक्षा
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन को सम्मान देने से पहले जमीनी रिपोर्ट जरूर देखनी चाहिए। पुरस्कार को किसी व्यक्ति की उपस्थिति या लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि सच्ची ईमानदारी और कार्य परिणाम पर आधारित होना चाहिए।




