हर घर नल, लेकिन पानी गायब: जल जीवन मिशन की कागज़ी कामयाबी पर ज़मीनी सवाल, क्या यह “जल नहीं, मलाई मिशन” बनता जा रहा है?


योजना का दावा और जमीनी हकीकत

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन का लक्ष्य हर घर तक नल के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुंचाना है। देशभर में अरबों रुपये खर्च कर पाइपलाइनें बिछाई गईं, टंकियां बनीं और उद्घाटन कार्यक्रम हुए। लेकिन जमीनी सच्चाई कई इलाकों में इन दावों से बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।

नल लगे, पर पानी नदारद

कई गांवों और मोहल्लों में नल तो लगा दिए गए, लेकिन उनमें पानी नहीं आ रहा। कहीं सप्ताह में एक दिन जलापूर्ति होती है, तो कहीं महीनों से एक बूंद भी नहीं टपकी। इसके बावजूद संबंधित विभागों ने कार्य पूर्ण होने के प्रमाण पत्र जारी कर दिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब पानी नहीं पहुंचा, तो काम पूरा कैसे मान लिया गया?

कागज़ों में “हर घर जल”, ज़मीन पर टैंकर

सरकारी रिपोर्टों में गांव-गांव को “हर घर जल” योजना से आच्छादित दिखाया जा रहा है। फाइलों में लक्ष्य पूरे होने का दावा किया जा रहा है।
लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीण आज भी हैंडपंप, कुएं और टैंकरों के भरोसे जीवन गुज़ार रहे हैं।
क्या यह कागज़ी प्रगति नहीं?
क्या शासन को वास्तविक स्थिति से दूर रखा जा रहा है?

टैक्स की रकम का दुरुपयोग या लापरवाही?

जल जीवन मिशन जनता द्वारा दिए गए टैक्स के पैसों से चलाया जा रहा है। यदि पानी नहीं मिल रहा और फिर भी ठेकेदारों को भुगतान हो चुका है, तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला बनता है।
यहां ठेकेदारों, अधिकारियों और कार्यान्वयन एजेंसियों—तीनों की भूमिका संदेह के घेरे में है।

बिना सत्यापन कैसे हुए भुगतान?

सबसे अहम प्रश्न यह है कि—
क्या बिना भौतिक सत्यापन के ही बिल पास कर दिए गए?
क्या सिर्फ कागज़ी रिपोर्ट के आधार पर करोड़ों रुपये जारी हुए?
और अगर ऐसा है, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?

जांच होगी या फिर लीपापोती?

जनता जानना चाहती है कि—
क्या इन मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
क्या झूठी प्रगति रिपोर्ट देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
या फिर मामला फाइलों में दबाकर आगे बढ़ जाया जाएगा?

जनता के सवाल, शासन के सामने चुनौती

ग्रामीण और आम नागरिक आज साफ पूछ रहे हैं—
अगर नल से पानी नहीं आएगा, तो योजना का मतलब क्या है?
अगर पानी सिर्फ बोर्ड, शिलापट्ट और फाइलों में बहेगा, तो क्या यही विकास है?

निष्कर्ष: योजना बचे या भरोसा टूटे

जल जीवन मिशन को सच में सफल बनाना है, तो
कागज़ी वाहवाही नहीं, ज़मीनी सच्चाई सामने लानी होगी।
दोषियों पर सख्त कार्रवाई और पारदर्शी निगरानी ही इस योजना को बचा सकती है।
वरना यह योजना जनता के लिए नहीं,
कुछ लोगों के लिए “जल जीवन मिशन” से ज़्यादा “मलाई मिशन” बनकर रह जाएगी।

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