
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की पवित्र रात, शिव-पार्वती विवाह की दिव्य स्मृति
आज दुनियाभर में महाशिवरात्रि का पावन पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि भगवान शिव को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इसी पावन रात्रि में भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था। यही कारण है कि यह दिन शिवभक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।
शुभ योग और मध्यरात्रि का विशेष मुहूर्त, बढ़ेगा पूजा का प्रभाव
ज्योतिषीय दृष्टि से इस बार महाशिवरात्रि पर विशेष शुभ योग बन रहे हैं, जो पूजा के प्रभाव को और बढ़ाने वाले माने जा रहे हैं। शिव पूजा के लिए 15 फरवरी की रात्रि लगभग 12:09 बजे से 1:01 बजे तक का समय अत्यंत फलदायी बताया गया है। इस दौरान शिवलिंग पर अभिषेक और मंत्र जाप करना विशेष लाभकारी माना गया है।
चार प्रहर पूजा का समय: रात्रि भर चलेगी आराधना
महाशिवरात्रि पर चार प्रहर पूजा की परंपरा है, जिसमें पूरी रात शिव आराधना की जाती है—
- पहला प्रहर: शाम 6:11 बजे से रात 9:23 बजे तक
- दूसरा प्रहर: रात 9:23 बजे से 16 फरवरी रात 12:35 बजे तक
- तीसरा प्रहर: रात 12:35 बजे से तड़के 3:47 बजे तक
- चौथा प्रहर: तड़के 3:47 बजे से सुबह 6:59 बजे तक
भक्त इन चारों प्रहरों में क्रमशः पूजा-अर्चना और अभिषेक कर सकते हैं।
किसके लिए विशेष लाभकारी मानी जाती है महाशिवरात्रि पूजा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं या जिनकी कुंडली में चंद्र दोष अथवा शनि की साढ़ेसाती/ढैय्या चल रही हो। भगवान शिव को ‘महाकाल’ कहा जाता है, इसलिए इस दिन की पूजा जीवन की बाधाओं और कष्टों से राहत दिलाने वाली मानी जाती है।
महाशिवरात्रि पूजा विधि: व्रत, अभिषेक और मंत्र जाप का महत्व
भक्त दिन की शुरुआत स्नान और व्रत संकल्प से करते हैं। दिनभर उपवास या फलाहार रखा जाता है। रात्रि में शिवलिंग पर गंगाजल, दूध और शहद से अभिषेक किया जाता है तथा ‘ऊं नमः शिवाय’ मंत्र का जाप किया जाता है। विवाहित महिलाएं माता पार्वती को सुहाग सामग्री अर्पित कर सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।




