
राघवेन्द्र की संवेदना ने लिख दी,विकास की नई इबारत।
कभी आठवीं तक स्कूल,अब नर्सिंग और मेडिकल कॉलेज की होगी पढ़ाई ।
जांजगीर-चाम्पा / कल तक जो धरती हिंसा और खुनी संघर्ष की गूँज से दहलती थी, आज वहाँ शिक्षा की ताकत और किताबों के पन्नों की सरसराहट एक नई इबारत लिख रही है। “राघवेन्द्र पाण्डेय की संवेदना और साहस ने रक्तरंजित ज़मीन की तस्वीर बदल दी है, जहाँ कभी विकास के नाम पर सिर्फ सन्नाटा पसरा था। जहां आठवीं तक ही स्कूल थी, वहां हायर सेकेण्डरी स्कूल, अब नर्सिंग और मेडिकल काॅलेज तथा भव्य अस्पताल का निर्माण हो रहा है।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 10 किलोमीटर की दुरी पर स्थित गांव कुटरा जहां 15साल पहले तक छोटी-छोटी बातों पर हत्या आम बात थी। आये दिन यहां से खुनी संघर्ष और नरसंहार की खबरें आती थी वहां अब बच्चों की पढ़ाई और सफलता की कहानियाँ सुनाई देती है।
पुर्वजों की जमीन पर बना शिक्षा का मंदिर:
लंबे समय से अशांत रहे कुटरा के ग्रामीणों ने वर्ष 2007 में जांजगीर निवासी और कुटरा मालगुजार परिवार के राघवेन्द्र सरकार पाण्डेय से गांव में शांति की अपील करने पहल की मांग की थी। जिसके बाद राघवेन्द्र पाण्डेय के पहल पर शासन ने वर्ष 2008 में रामसरकार मिडिल स्कूल का हाईस्कूल में उन्नयन किया तथा वर्ष 2014 में कुटरा के सरकार राघवेन्द्र पाण्डेय ने अपने पुर्वजों की जमीन में शासकीय हाईस्कूल की स्थापना के लिए नींव रखी तथा गांव में सामुहिक शांति का आह्वान किया था।
वर्ष 2014 में विद्यालय का हायर सेकेण्डरी में उन्नयन किया गया । उनके पहल का असर अब दिखने लगा है,जहाँ कल तक हिंसा का साया था, वहाँ आज बच्चे रामसरकार पाण्डेय शासकीय हायर सेकेण्डरी स्कूल में अपना भविष्य संवार रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण व स्थानीय जागरूकता :
बेटियाँ अब न केवल स्कूल जा रही हैं, बल्कि उच्च शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनकर अपने गाँव और समाज का नेतृत्व कर रही हैं। गांव की बेटी प्रिंसी सी.ये. है मिंटी ने एमबीबीएस की पढ़ाई की है गांव की एक बेटी मारीसस में एमबीबीएस कर रही है। तथा शिक्षित युवा अब खेती के आधुनिक तरीकों और छोटे उद्योगों के माध्यम से क्षेत्र की आर्थिक स्थिति को बदल रहे हैं। गजानंद खरे हर्बल साबुन का निर्माण कर रहे है, राजकुमार कश्यप व कुमार बंधु लाठिया खेती के नई तकनीक गांव वालों को सिखा रहे है। राजू कश्यप और रामेश्वर युवाओं में राजनीतिक चेतना जगा रहे है, पवन दिनकर,व विक्रम खरे श्रमिकों की आवाज है।
संवेदना बनी ताकत :
उनके काम की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशीलता रही है उन्होंने न केवल गांव में हाईस्कूल की स्थापना की नींव रखी बल्कि उन बच्चों के दर्द को भी समझा जिनके परिवारों ने हिंसा की मार झेली थी। उनके द्वारा स्थापित ‘शिक्षा के मंदिर’ ने गांव में साक्षरता बढ़ाई तथा लोगों की सोच में ‘प्रतिशोध’ की जगह ‘प्रगति’ को भी स्थापित किया। उन्होंने गांव के लोगों में यह विश्वास पैदा किया है कि संघर्ष का समाधान हिंसा नहीं, बल्कि संवाद और प्रगति है। लहू-लुहान अतीत को पीछे छोड़कर यह धरती अब एक समृद्ध और शांत भविष्य की ओर बढ़ रही है।
सामाजिक कार्य एक मिसाल
जहाँ प्रगति और समृद्धि कभी एक सपना हुआ करती थी,वहां अब शासन द्वारा गांव में नर्सिंग और मेडिकल कॉलेज तथा भव्य अस्पताल का निर्माण कराया जा रहा है। राघवेन्द्र पाण्डेय ने कुटरा में हाईस्कूल तथा समीप के गांव कुथुर में आंगनबाड़ी व सामुदायिक भवन बनाने हेतु अपनी पैत्रिक भुमि सरकार को दिया है। उनका समाजिक उत्थान का कार्य मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय है तथा लोग ईसे मिसाल के तौर पर देख रहे हैं।




