
ऐतिहासिक विश्व प्रसिद्ध 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा का शुभारंभ आज हुई। जगदलपुर बस्तर में प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी दशहरे का आगाज हरेली अमावस को पाट जात्रा पूजा विधान से शुरू हुआ। इसमें प्रथम रस्म के तौर पर पाटजात्रा का विधान पूरा किया गया है। बस्तर दशहरा मे 7 दिनों तक परिक्रमा करने वाला रथ का निर्माण की पहली लकड़ी को स्थानीय बोली में ठुरलु खोटला एवं टीका पाटा कहते हैं। बस्तर दशहरे के लिए तैयार किए जाने वाली रथ निर्माण की पहली लकड़ी दंतेश्वरी मंदिर के सामने ग्राम बिलौरी से जगदलपुर लाया गया है।
रथ निर्माण करने वाले कारीगरों एवं ग्रामीणों के द्वारा मांझी चालाकी, मेंबरीन के साथ जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में पूजा विधान एवं बकरे की बलि के साथ पाट जात्रा की रस्म संपन्न हुई।
बस्तर दशहरा 1408 ईस्वी से अब तक अनवरत बड़े ही उत्साह एवं धूमधाम से जगदलपुर शहर में मनाया जाता है। इसमें पूरे बस्तर के लाखों आदिवासी सहित देश विदेश से सैलानी बस्तर दशहरा में सम्मिलित होते हैं। इस पर्व की रस्म 75 दिन पूर्व पाट जात्रा से प्रारंभ हो जाती है। बस्तर दशहरे में दो मंजिला रथ खींचा जाता है। जिसमें मां दंतेश्वरी का छत्र सवार रहता है। दंतेवाड़ा से हर वर्ष माईजी की डोली दशहरा में सम्मिलित होने लाई जाती है, जिसे विधि विधान से रसम के साथ परघाया जाता है, जिसे मावली परघाव रसम कहा जाता है। 75 दिनों पश्चात मावली माता के डोली के विदाई के साथ ही बस्तर दशहरा पर्व संपन्न होता है।




