
छत्तीसगढ़: वनक्षेत्रों में नरवा विकास के सुखद परिणाम मिले हैं। जिन वनक्षेत्रों के पारंपरिक जल स्त्रोत पहले जनवरी, फरवरी में ही सुख जाते थे, उनमें सभी महीनों में पानी की धार बहते देखा गया है। इसके साथ ही वनक्षेत्र से सटे गांवों में किसानों के कुओं में वाटर लेबल एक से दो फीट तक बढ़ गया है। प्रदेश के वनक्षेत्रों से भूजल स्तर को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। नरवा विकास प्रोजेक्ट से न सिर्फ वनक्षेत्रों में वाटर लेवल को लेकर सुखद संकेत मिले हैं, बल्कि किसानों के कुएं का भूजल स्तर भी एक से दो फीट तक बढ़ा है। इतना ही नहीं, जिन क्षेत्रों में जनवरी फरवरी में नाले सूख जाया करते थे, वहां अब बारहों महीने पानी का हल्का बहाव देखा जा रहा है। कुल मिलाकर तीन साल पहले सीएम भूपेश बघेल द्वारा जिन उद्देश्यों को लेकर नरवा, गरुआ, घुरुआ, बारी प्रोजेक्ट की शुरूआत की गई थी, उसमें नरवा प्रोजेक्ट के सुखद परिणाम अब सामने आने लगे हैं।
बता दें, वनबल प्रमुख राकेश चतुर्वेदी के निर्देश पर वन महकमा प्रदेश के 25 जिलों के 32 वनमंडलों में नरवा विकास योजना के तहत नरवा बंधान का काम कर रहा है। बीते तीन सालों से चल रहे इस काम का धरातल पर अब असर दिखने लगा है। हाल ही में सामने आई जानकारी के मुताबिक राष्ट्रीय उद्यानों, टाइगर रिजर्व, सामाजिक वानिकी और एलिफेंट रिजर्व क्षेत्र के अंतर्गत 137 जलग्रहण क्षेत्रों में 863 नरवाओं के 4.84 लाख हेक्टेयर में 11 लाख 99 हजार 772 संरचनाएं निर्मित की गई हैं। यही वजह है कि बड़े स्केल में नरवा विकास की वजह से वनक्षेत्रों और उससे लगे मैदानी क्षेत्रों में वाटर लेवल बढ़ाने में मदद मिली है। अफसरों का दावा है कि नरवा विकास योजना से वनग्रामों के किसानों के कुएं का वाटर लेबल पिछले दो वर्षों में एक से दो फीट बढ़ गया है। इसके साथ ही जंगल में अमूमन जनवरी फरवरी में सुख जाने वाले नरवा में हल्का पानी का बहाव देखा जा सकता है।
ऐसे कर रहे नरवा को विकसित नरवा विकास योजना के तहत जलस्त्रोतों को संरक्षित करने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर तकनीकी प्रशिक्षण एनजीओ आईसीआरजी द्वारा दिया जा रहा है, जिसमें बेस लाईन सर्वे द्वारा नरवा का चिन्हांकन करना, जीआईएस पद्धति से डीपीआर तैयार करना और क्षेत्राीय स्तर पर घाटी पहुंच के आधार पर कार्यों का क्रियान्वयन समय पर किया जाना बताया जा रहा है। कार्यों के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कुल 36 एनआरएम इंजीनियरों की तकनीकी मदद की जा रही है। नरवा विकास से वनों का विकास वनबल प्रमुख के मुताबिक नरवा विकास से वनक्षेत्रों में कई तरह के लाभ प्राप्त होंगे। इससे वनों में मिट्टी के कटाव में कमी होगी। वनक्षेत्रों में भू-जल स्तर में वृद्धि होने से वनों के पुनरोत्पादन क्षमता में बढ़ोत्तरी होगी। साथ ही वन्यप्राणियों के लिए वर्षभर पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध हो सकेगा। वनों के आसपास के रहवासियों के लिए पेयजल स्त्रोतों के विकास से कृषि भूमि की सिंचाई क्षमता में भी वृद्धि होगी। इस तरह ग्रामीण और वनक्षेत्रों में भी रोजगारों का सृजन हो सकेगा।
24 हजार संरचनाओं का निर्माण प्रगति पर वनबल प्रमुख राकेश चतुर्वेदी के मुताबिक वर्तमान में वन क्षेत्रों में नरवा विकास प्रोजेक्ट के तहत 24 हजार 274 संरचनाओं का निर्माण प्रगति पर है। इसके साथ ही वनक्षेत्रों में भू-जल संरक्षण तथा आठ हजार के करीब नरवा, पारंपरिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने का कार्य किया जा रहा है। वनक्षेत्रों में नरवा विकास का कार्य कैंपा मद से किया जा रहा है। जबकि राजस्व भूमि में नरवा विकास का कार्य पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा नरेगा मद से किया जा रहा है। वनक्षेत्रों में नरवा विकास के लिए एपीओ 2021-22 में कैंपा ने प्रस्तावित 1 हजार 962 नरवा विकास के लिए 392.26 करोड़ की राशि केंद्रीय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अनुमोदित कर स्वीकृति दे दी है। इससे पूरे प्रदेश में 37 लाख 99 हजार 26 संरचनाएं एवं 8.17 लाख हेक्टेयर जलग्रहण क्षेत्राें का उपचार किया जाना है। बता दें, नरवा विकास के लिए अब तक 317.32 करोड़ रुपए की राशि खर्च की जा चुकी है। वनक्षेत्रों में नरवा विकास के सुखद परिणाम मिले हैं। जिन वनक्षेत्रों के पारंपरिक जल स्त्रोत पहले जनवरी, फरवरी में ही सुख जाते थे, उनमें सभी महीनों में पानी की धार बहते देखा गया है। इसके साथ ही वनक्षेत्र से सटे गांवों में किसानों के कुओं में वाटर लेबल एक से दो फीट तक बढ़ गया है।




